दादी-नानी और पिता-दादाजी के बातों का अनुसरण, संयम बरतते हुए समय के घेरे में रहकर जरा सा सावधानी बरतें तो कभी आपके घर में डॉ. नहीं आएगा. यहाँ पर दिए गए सभी नुस्खे और घरेलु उपचार कारगर और सिद्ध हैं... इसे अपनाकर अपने परिवार को निरोगी और सुखी बनायें.. रसोई घर के सब्जियों और फलों से उपचार एवं निखार पा सकते हैं. उसी की यहाँ जानकारी दी गई है. इस साइट में दिए गए कोई भी आलेख व्यावसायिक उद्देश्य से नहीं है. किसी भी दवा और नुस्खे को आजमाने से पहले एक बार नजदीकी डॉक्टर से परामर्श जरूर ले लें.
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नोट : यहाँ पर प्रस्तुत आलेखों में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी को संकलित करके पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयास किया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि इनमें बताई गयी दवाओं/तरीकों का प्रयोग करने से पूर्व किसी योग्य चिकित्सक से सलाह लेना उचित होगा।-राजेश मिश्रा

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मंगलवार, जून 30, 2015

फोड़े-फुंसियों के उत्पात से ऐसे पाएं निजात

घरेलू नुस्खे और परहेज़ से पाएं हर मुश्किल आसान


फोड़े-फुंसियों या दाद-खाज खुजली जैसी चमड़ी की बीमारियों को पीछे प्रमुख रूप से रक्त कादूषित होना होता है। जब शरीर का खून दूषित यानी गंदा हो जाता है तो कुछ समय के बाद उसका प्रभाव बाहर त्वचा पर भी नजर आने लगता है। प्रदूषण चाहे बाहर का हो या अंदर का वो हर हाल में अपना दुष्प्रभाव दिखाता ही है। बाहरी और भतरी प्रदूषण ने मिलकर हमारे शरीर की प्राकृतिक खूबसूरती को छीनकर कई सारे त्वचा रोगों को जन्म दिया है फोड़े- फुंसियां भी उन्हीं में से एक हैं।

आज दुनिया का हर दूसरा व्यक्ति चमड़ी से जुड़े किसी न किसी रोग से जूझ रहा है। खुजली,जलन, फुंसियां, घमोरियां, दाद, लाल-सफेद चकत्ते... जैसी कई समस्याएं हैं जिनसे हर कोई परेशान है या कभी न कभी रह चुका है। कई बार छूत से यानी इनसे संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आने पर खुद को भी संक्रमण लगने से भी फोड़े- फुंसी या खुजली जैसी कोई त्वचा संबंधी समस्या हो सकती है।

यहां हम कुछ ऐसे घरेलू उपाय दे रहे हैं जो बर्सों से आजमाए और परखे हुए हैं। ये नुस्खे कारगर तो हैं ही साथ ही इनकी सबसे बड़ी खाशियत यह है कि इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है, ऊपर से ये हैं भी बहुत ही सस्ते..गर्मी के मौसम में अक्सर स्किन सम्बन्धी समस्याएं पनपने लगती हैं। यही नहीं इस मौसम के खत्म होने के बाद आने वाली बारिश कई बार इन समस्याओं में और भी बढ़ोत्तरी कर डालती है। ऐसे में जरूरी है कि इसे लेकर सजग रहा जाए।

यहां हम कुछ ऐसे घरेलू उपाय दे रहे हैं जो बर्सों से आजमाए और परखे हुए हैं। ये नुस्खे कारगर तो हैं ही साथ ही इनकी सबसे बड़ी खाशियत यह है कि इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है, ऊपर से ये हैं भी बहुत ही सस्ते..

बढ़ जाए जब तकलीफ

कई बार ध्यान न देने पर छोटी-सी फुंसी या फोड़े की तकलीफ भी गंभीर रूप ले लेती है। कुछ लोगों को गर्मी के मौसम में सर, आंखों या चेहरे पर पीली-लाल बड़ी फुंसियां होने की समस्या होती है।

ये फुंसियां पककर फूटती हैं तो संक्रमण के फैलने की आशंका भी हो सकती है। इसके अलावा तैलीय या ऑइली स्किन वालों को भी पिम्पल्स ज्यादा उभरते हैं। ये फुंसियां दर्द, जलन, खुजली आदि जैसी तकलीफ दे सकती हैं। यदि ऐसे में पर्याप्त साफ-सफाई का ध्यान न रखा जाए तो यह घाव बढ़कर गंभीर हो सकता है।

इन बातों का रखें ध्यान

गर्मी हो या अन्य मौसम, साफ पानी से नियमित नहाना सबसे पहली जरूरत है। इससे शरीर पर लगी धूल-मिटटी और पसीने की गंदगी साफ होती है। यही नहीं पानी शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में भी मदद करता है। साथ ही पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की भी आदत डालें। इससे शरीर को अंदर से साफ रखने में मदद मिलेगी।

कोशिश करें की भोजन में ताजे फल और सलाद ज्यादा खाएं। साथ ही तले-गले और गरिष्ठ भोजन से बचें। व्यायाम जरूर अपनाएं और सुबह ताजी हवा के सम्पर्क में आएं। जिम या अन्य एक्सरसाइज के दौरान आने वाले पसीने को साफ कपड़े से थपथपाकर पोंछें। इसके बाद अच्छे से नहाएं।

कॉटन के या पसीने को सोखने वाले मटेरियल के कपडे पहनें। अगर हो सके तो दिन में दो बार नहाएं। नहाने के पानी में एंटीसेप्टिक या अन्य संक्रमणों से बचाने वाले तेल आदि डालने से पसीने में दुर्गन्ध और संक्रमण से बचा जा सकता है, ऐसे उपाय अपनाएं।

यदि आपको किसी प्रकार के संक्रमण की टेंडेंसी है या फैमिली हिस्ट्री है तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें। यदि 3-4 दिन में फोड़े-फुंसी ठीक न हों तो भी डॉक्टर से सलाह जरूर लें। आम से होने वाले संक्रमण के मामले में भी आमों को खाने से पहले अच्छी तरह धोने की और सावधानी से उसका ऊपरी सिरा हटाने की आदत डालें। हाथों को भी साफ रखने और अच्छे से धोने का ध्यान रखें। साथ ही अंडरगार्मेंट्स और अन्य कपड़ों को भी साफ रखें। ये भी संक्रमण का कारण बन सकते हैं।

पसीना, प्रदूषण और बहुत कुछ

गर्मी के मौसम में पसीना फोड़े-फुंसी या रैशेज के होने का बड़ा कारण बन सकता है। लगातार आने वाले पसीने से एक जगह पर हुई तकलीफ शरीर में दूसरी जगहों पर भी पहुंच सकती है। इसके अलावा सीधे सूरज की किरणों या तेज गर्मी के सम्पर्क में आने, धूल-धुएं से, किसी खराब कॉस्मेटिक से, सिंथेटिक या मौसम के लिहाज से अन्य तरह के गलत मटेरियल के कपड़े पहनने से भी फोड़े-फुंसी या संक्रमण हो सकते हैं।

घमौरियां तो इस मौसम में आम हैं ही। कई बार तो आम को गलत तरीके से खाने से भी लोगों को चेहरे पर घाव जैसा पनप जाता है। इन सभी के पीछे असल कारण मौसम और बढ़ा हुआ तापमान ही है।

फोड़े फुंसी की चिकित्साः

  • थोड़ी सी साफ रूई पानी में भिगो दें, फिर हथेलियों से दबाकर पानी निकाल दें। तवे पर थोड़ा सा सरसों का तेल डालें और उसमें इस रूई को पकायें। फिर उतारकर सहन कर सकने योग्य गर्म रह जाय तब इसे फोड़े पर रखकर पट्टी बाँध दें। ऐसी पट्टी सुबह-शाम बाँधने से एक दो दिन में फोड़ा पककर फूट जायेगा। उसके बाद सरसों के तेल की जगह शुद्ध घी का उपयोग उपरोक्त विधि के अनुसार करने से घाव भर के ठीक हो जाता है।
  • फोड़े फुंसियों पर वट वृक्ष या बरगद के पत्तों को गरम कर बाँधने से शीघ्र ही पक कर फूट जाते
  • आयुर्वेद के अनुसार नीम की सूखी छाल को पानी के साथ घिसकर फोड़े फुंसी पर लेप लगाने से बहुत लाभ मिलता है और धीरे-धीरे इनकी समाप्ति हो जाती है।
  • जब तक समस्या से पूरी तरह से छुटकारा नहीं मिल जाता मीठा यानी शक्कर से बनी,बासी, तली-गली और अधिक मिर्च-मसालेदार चीजों को पूरी तरह से छोड़ दें।
  • फोड़े-फुंसी, दराद या खुजली वाले स्थान पर मूली के बीज पानी में पीस कर गरम करके लगाने से तत्काल लाभ होता होगा।
  • नीम की पत्तियों को पीस कर फोड़े-फुंसी, दराद या खुजली वाले स्थान पर लगाने और पानी के साथ पीने से बहुत सीघ्र लाभ होता है।
  • नींबू के छोटे पत्ते खाने से लाभ होता है। नींबू में मौजूद विटामिन सी खून साफ करता है. फोड़े-फुंसियों पर नींबू की छाल पीसकर लगाएं. सप्ताह में एक बार फोड़े-फुंसिंयों पर मुल्तानी मिट्टी लगाएं. एक-दो घंटे बाद नहाएं ।
  • पालक, मूली के पत्ते, प्याज, टमाटर, गाजर, अमरुद, पपीता आदि को अपने भोजन में नियमित रूप से शामिल करें।
  • सुबह खाली पेट चार-पांच तुलसी की पत्तियां चूंसने से भी त्वचा रोगों में स्थाई लाभ होता है।
  • पानी अधिक से अधिक पीएं।
  • सुबह उठकर 2 से 3 किलो मीटर घूमने के लिये अवश्य जाएं ताकि आपके शरीर और रक्त को शुद्ध ताजा हवा मिल सके और शरीर का रक्त प्रवाह भी सुधर सके।

रविवार, जून 28, 2015

एक्ने और पिम्पल्स से छुटकारा : राज

आयुर्वेद आजमायें एक्‍ने की समस्‍या से निपटने के लिए

ज़रूरी नहीं कि एक्ने (किल -मुहासों ) सिर्फ टीन-एजर्स को ही हों. आजकल ये हर किसी को होते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस उम्र के हैं. ऐसा शायद इसलिए क्योंकि आज की लाइफ बहुत ही ज्यादा स्ट्रेस (टेंशन भरी) और प्रदूषण से भरी हुई है. रंग चाहे सांवला हो या गेहुंआ, पिम्पल और रेडनेस का सामना सभी को करना पड़ रहा है. इसके बाद हमेशा के लिए रह जाने वाले ब्लेमिशेस भी इस एक्सपीरिएंस को जाने नहीं देते.  'एक्ने' के कारण : त्वचा का तैलीय होना एक्ने होने का मुख्य कारण है।  हार्मोनल समस्या भी एक प्रमुख कारण है।  दिन में दो बार आयल फ्री क्लींजर से त्वचा की नियमित सफाई करें।  पानी का अधिक से अधिक सेवन करें। एक्ने हर किसी को तंग करते हैं। हालांकि यह एक आम समस्या है, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर इसका प्राकृतिक उपचार किया जाए तो इससे काफी हद तक छुटकारा मिल सकता है।

  • युवावस्था में हार्मोंस में बदलाव के कारण होती है एक्‍ने की समस्‍या।
  • सिबेशस ग्रंथि की अति सक्रियता और हार्मोन के कारण होते हैं एक्‍ने।
  • गाय के ताजे दूध में चिरौंजी को पीसकर इसका लेप चेहरे पर लगायें।
  • चमेली के तेल को सुहागा में मिलाकर रात को सोने से पहले लगायें।
अगर चेहरे पर मुंहासों के जैसे बहुत सारे दाने, हो जाएं और बहुत दिनों तक ठीक न हों तो जरा सावधान हो जाइए। यह एक्ने हो सकते हैं। एक्ने को आयुर्वेदिक उपचार से ठीक किया जा सकता है। दरअसल त्वचा के नीचे स्थित सिबेशस ग्लैंड्स से त्वचा को नम रखने के लिए एक तेल निकलता है। ये ग्रंथियां चेहरे, पीठ, छाती और कंधों पर सबसे ज्यादा होते हैं।


अगर ये ज्यादा सक्रिय हो जाएं तो रोमछिद्र चिपचिपे होकर बंद हो जाते हैं और उनमें बैक्टीरिया पनपने लगते हैं जो आगे चलकर एक्ने का कारण बनते हैं। सिबेशस ग्लैंड्स की अति सक्रियता की प्रमुख वजह एंड्रोजन हार्मोन की अधिकता होती है। एंड्रोजन पुरुष सेक्स हार्मोन है और यह लड़के और लड़कियों दोनों में ही होता है। किशोरावस्था में इसका प्रभाव ज्यादा होता है। आइए हम आपको एक्‍ने के उपचार के लिए आयुर्वेद तरीकों के बारे में बताते हैं।

एक्ने की समस्या :-

कुछ लड़कियों को पीरियड्स से पहले बार-बार मुंहासे निकल आते हैं जो बिगड़कर एक्ने का रूप ले सकते हैं। ऐसा ओव्यूलेशन के बाद प्रोजेस्टेरॉन हार्मोन के ज्यादा सिक्रीशन की वजह से भी होता है। इससे त्वचा पर छोटे-छोटे दानों के गुच्छे जैसे बन जाते हैं। इसी तरह सिबेशस ग्रंथियों से उत्पन्न सीबम त्वचा के पिगमेंट मिलकर रोमछिद्रों को ब्लॉक कर देता है तो ब्लैकहेड्स बनते हैं। अगर त्वचा की अंदरूनी परत में सीबम जमा हो जाता है तो व्हाइटहेड्स बनते हैं। कई बार ब्लैकहैड्स और व्हाइटहेड्स त्वचा के भीतर फैलने के बाद फूट जाते हैं, जिससे बाहरी त्वचा पर एक्ने और ज्यादा फैल सकता है।

दरअसल टीनेज में हार्मोंस में लगातार बदलाव आते रहते हैं, नतीजन चेहरे पर दाग, धब्बे, मुंहासे और एक्ने की समस्या होने लगती हैं। एक्ने ऐसी समस्या है जो आमतौर पर टीनेज और युवावस्था में अधिक होती है। अगर आपके परिवार में पहले भी परिवार वालों को एक्ने रहे हैं यानी आपके मां या पिता को भी यह समस्या रही है तो भी आपको इससे बचाव के लिए तैयार रहना चाहिए। एक्ने त्वचा का एक विकार है। एक प्रकार से यह मुंहासों का ही बिगड़ा हुआ रूप है।

चिरौंजी :-

गाय के ताजे दूध में चिरौंजी पीसकर इसका लेप बनाकर चेहरे पर लगाएं और सूखने पर धो लें, इससे एक्ने की समस्या से निजात मिलेगी।

चमेली का तेल :-

चमेली के तेल को सुहागा में मिलाकर रात को सोते समय चेहरे पर लगाकर मसलें। सुबह बेसन को पानी से गीला कर गाढ़ा-गाढ़ा चेहरे पर लगाकर मसलें और पानी से चेहरा धो डालें। इससे चेहरे पर होने वाली जलन पर बहुत आराम मिलेगा।

मसूर की दाल :-

मसूर की दाल 2 चम्मच लेकर बारीक पीस लें। इसमें थोड़ा सा दूध और घी मिलाकर फेंट लें और पतला-पतला लेप बना लें। इस लेप को मुंहासों पर लगाएं।

जायफल :-

मुंहासों को दूर करने के लिए जायफल भी बहुत फायदेमंद होता है। इसके लिए साफ पत्थर पर पानी डालकर जायफल घिसकर लेप को कील-मुंहासों पर लगाएं।

अन्‍य आयुर्वेदिक उपाय :-

शुद्ध टंकण और शक्ति पिष्टी (आयुर्वेदिक दुकानों में उपलब्ध) 10-10 ग्राम मिलाकर एक शीशी में भर लें। थोड़ा सा यह पावडर और शहद अच्छी तरह मिलाकर कील-मुंहासों पर लगाएं।
लोध्र, वचा और धनिया, तीनों 50-50 ग्राम खूब बारीक पीसकर शीशी में भर लें। एक चम्मच चूर्ण थोड़े से दूध में मिलाकर लेप बना लें और कील-मुंहासों पर लगाएं। आधा घंटे बाद पानी से धो डालें।
सफेद सरसों, लोध्र, वचा और सेन्धा नमक 25-25 ग्राम बारीक चूर्ण करके मिला लें और शीशी में भर लें। एक चम्मच चूर्ण पानी में मिलाकर लेप बना लें और कील-मुंहासों पर लगाएं।
मसूर, वट वृक्ष की कोंपलें (नरम छोटी पत्तियां), लोध्र, लाल चन्दन, सब 10-10 ग्राम बारीक चूर्ण करके मिला लें। एक चम्मच चूर्ण पानी के साथ पीसकर लेप बना लें। इसे कील-मुंहासों पर लगाएं।

आयुर्वेद उपचार के साथ ही एक्ने की समस्‍या से बचने के लिए चेहरे की साफ-सफाई रखना जरूरी हैं, ऐसे में चेहरे को बार-बार पानी से धोएं। और मेकअप कम से कम करें और गर्मियों में वॉटरप्रूफ मेकअप का ही इस्तेमाल करें।

अन्‍य उपाय :-

आज आपको राज इस परेशानी से छुटकारा दिलाने के 10 तरीके बता रहा है. इसे ट्राय करें और पाएं क्लिर स्किन.

1. एक अच्छा स्किन केयर रूटीन बनाएं
अगर आपकी स्किन ऑयली है और पिम्पल्स बहुत होते हैं तो एक अच्छा स्किन केयर रुटीन फॉलो करना ज़रूरी है. ‘क्लींज-टोन-मॉइश्चराइज़’ का साइकल हर दिन दो बार ज़रूर करें.

2. जेंटल क्लीन्जर यूज़ करें
क्लीन्जिग का असर पूरी तरह आपके द्वारा इस्तेमाल किए गए क्लीन्जर पर निर्भर करता है. हार्श या सख्त क्लीन्जर आपकी स्किन के अच्छे ऑयल और प्रोटेक्टिव बैरियर को भी हटा देते हैं. साबुन आपकी स्किन को बहुत ज्यादा ड्राय कर सकता है. इसलिए एक ऐसा क्लीन्जर इस्तेमाल करें जो आपकी स्किन ऑयल को बैलेंस तरीके से हटाए और जिसमें एंटी-इंफ्लामेटरी इनग्रिडिएंट्स भी हों, जो इरिटेटिड स्किन को आराम पहुंचाए. साथ ही, क्लीन्जिग बस अपने फिंगर टिप्स से ही करें. क्रीम-बेस्ड की जगह जैल मॉइश्चराइज़र लें. जैल-बेस्ड आपकी स्किन को हाइड्रेड करता है.

3. एक्सफोलिएट करें लेकिन सावधानी से
एक्सफोलिएट करना स्किन के लिए अच्छा है– परफेक्शन की चाह में आप अपनी स्किन को स्क्रब कर सकते हैं और ध्यान रखें कि उस पर ऑयली परत या बैक्टीरिया न पनपे, पर एक्सफोलिएंट ऐसा चूज़ करें जो प्रयोग में माइल्ड और जेंटल हो. बहुत सारे इनग्रिडिएंट्स और बीड्स जैसे हार्श कॉम्पोनेंट्स वाले एक्स्फोलिएंट्स को अवॉइड करें. ग्लाइसोल एसिड बेरंग हुए स्किन का कलर निखारता है, इसलिए एक ऐसा एक्स्फोलिएंट चुनें जिसमें यह हो.

4. टॉवल की थपकी लें
आपने सुना होगा – भगवान कण-कण में बसता है, इसलिए नहाने के बाद की केयर बहुत जरूरी है. थपकी देकर स्किन को सुखाएं और थोड़ा गीला ही रहने दें. इससे आपकी स्किन में इरिटेशन नहीं होगी.

5. ओवर-ड्राइंग अवॉइड करें
एक बार अगर आपने अपने ऑयलिनेस को हटाना डिसाइड कर लिया, तो आप इसे पूरी तरह हटाने की जैसे ठान ही लेते हैं और पूरी तरह ड्राई कर देते हैं. कभी भी एल्कोहल बेस्ड एंस्ट्रिजेंट्स का प्रयोग न करें, ये त्वचा को पूरी तरह ड्राई कर देते हैं.

6. अच्छी मॉइश्चराइजिंग टेकनीक का प्रयोग करें
जी हां, सभी को पता है कि एक अच्छे मॉइश्चराइजर का इस्तेमाल स्किन केयर का आधा काम पूरा कर देता है. नहाने के तुरंत बाद मॉइश्चराइज़र लगाएं ताकि नमी बनी रहे और एब्जॉर्ब्सन हो सके. रेटिनॉल, सेलिसिलिक (salicylic) और लैक्टिक एसिड वाले मॉइश्चराइज़र का प्रयोग करें क्योंकि ये ऐसे इंग्रिडिएंट्स हैं जो स्किन डैमेज को कंट्रोल करते हैं. हाइड्रेट करने वाले मॉइश्चराइज़र भी यूज़ कर सकते हैं.

7. आपके ब्यूटी इन्स्ट्रूमेंट्स साफ होने चाहिए
आपके वॉशिंग पैड्स से लेकर मेकप ब्रश तक साफ होने चाहिए ताकि उन पर बैक्टीरिया न पनपें. आपका पाउडर पफ भी हर सप्ताह साफ हो इसका ध्यान रखें और दो सप्ताह में कम से एक बार अपने ब्रश को शैंपू से ज़रूर साफ करें. ज़्यादा अच्छे रिजल्ट्स के लिए उन्हें एयर-ड्राई करें.

8. पिम्पल्स को हाथ न लगाएं
आपके हाथ गंदगी फैलाने का ज़रिया हैं. कभी भी पिम्पल को फोड़ने की कोशिश न करें, फिर भले ही वह कितना भी दर्द करता हो. इनपर स्पॉट रिडक्शन क्रीम लगाएं और इंतजार करें या अगर उतना समय न हो तो टूथपेस्ट ट्राई करें. बस एक डैब करें और पिम्पल ड्रायअप हो जाएंगे.

9. मेकप जो नुकसान न करें
अक्सर आप स्किन केयर का बहुत ध्यान रखती होंगी लेकिन अपनी कंवेनिएंट (सुविधा) से मेकप, जिसके कारण इसकी ज्यादा जरूरत पड़ती है, उसे भूल जाते हैं. ऐसा मेकप यूज करें या खरीदें जो पोर्स को बंद न करें. मिनरल बेस्ड कॉस्मेटिक यूज करें क्योंकि इनमें सिलिका, टाइटेनियम डाइऑक्साइड और जिंक ऑक्साइड जैसे इनग्रिडिएंट्स होते हैं जो एक्सेस ऑयल को सोखने में मदद करते हैं.

10. अपने बालों का ध्यान रखें
कई बार आपके बाल चहरे के लिए परेशानी की वजह बन सकते हैं. हेयर स्कैल्प के डैंड्रफ या इरिटेशन आपकी स्किन के लिए भी समस्या बन सकती हैं. यहां तक कि आर्टिफिशियल फ्रेगरेन्स और प्रिज़र्वेटिव्स शैंपू और हेयर प्रोडक्ट्स भी एक्ने का कारण बन सकते हैं. इसलिए इन्हें लेने से पहले इनका लेबल जरूर पढ़ें और सुरक्षित रहें.

शनिवार, जून 27, 2015

बहुत कारगर है नीम की पत्तियां

फोड़े-फुंसी से लेकर पीलिया तक को ठीक कर देती है 
पेट में कीड़े होने पर नीम की नई और ताजा पत्तियों का उपयोग करना चाहिए

Benefits-and-Uses-of-Neem



नीम का पेड़ अनेक रोगों में फायदेमंद माना गया है। नीम में इतने गुण हैं कि ये कई तरह के रोगों के इलाज में काम आता है। यहाँ तक कि इसको भारत में ‘गांव का दवाखाना’ कहा जाता है। यह अपने औषधीय गुणों की वजह से आयुर्वेदिक मेडिसिन में पिछले चार हजार सालों से भी ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है। नीम को संस्कृत में ‘अरिष्ट’ भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, ‘श्रेष्ठ, पूर्ण और कभी खराब न होने वाला।’

नीम के अर्क में मधुमेह यानी डायबिटिज, बैक्टिरिया और वायरस से लड़ने के गुण पाए जाते हैं। नीम के तने, जड़, छाल और कच्चे फलों में शक्ति-वर्धक और मियादी रोगों से लड़ने का गुण भी पाया जाता है। इसकी छाल खासतौर पर मलेरिया और त्वचा संबंधी रोगों में बहुत उपयोगी होती है।

नीम के पत्ते भारत से बाहर 34 देशों को निर्यात किए जाते हैं। इसके पत्तों में मौजूद बैक्टीरिया से लड़ने वाले गुण मुंहासे, छाले, खाज-खुजली, एक्जिमा वगैरह को दूर करने में मदद करते हैं। इसका अर्क मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, हर्पीस, एलर्जी, अल्सर, हिपेटाइटिस (पीलिया) वगैरह के इलाज में भी मदद करता है।

इसकी पत्तियों का सेवन करने से कई रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है।

1. नीम की पत्तियों को चबाकर खाने से शरीर में मौजूद रक्त शुद्ध हो जाता है।
2.नीम की दातुन करने से दांत मजबूत होने के साथ-साथ दांतों में चमक आ जाती है और मसूढ़े में भी सूजन नहीं होती।
3.नीम की वल्कल का लेप किसी भी घाव पर लगाने से घाव जल्दी ठीक हो जाता है।
4.नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से त्वचा संबंधी रोगों से निजात मिलती है।
5.नीम से तैयार तेल की मालिश करना भी लाभकारी होता है।
6.नीम से तैयार तेल कई औषधियां बनाने में प्रयोग किया जाता है, नीम का सेवन करना डायबीटिज के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है।
7.नीम के बीजों से तैयार चूर्ण का सेवन खाली पेट करने से बवासीर से राहत मिलती है।
8.नीम की पत्तियों को पानी में उबाल कर उस पानी से बाल धोने से बाल काले होने के साथ-साथ बालों का झड़ना भी बंद हो जाता है।
9.नीम की पत्तियों का सेवन करने से कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम हो जाती है।
10.कान दर्द होने पर नीम की पत्तियों का रस कान में डालने से दर्द से छुटकारा पाया जा सकता है।
11.नीम के तेल की कुछ बूंदों को दूध में डालकर पीने से जलन होने पर आराम मिलता है।

नीम के बारे में उपलब्ध प्राचीन ग्रंथों में इसके फल, बीज, तेल, पत्तों, जड़ और छिलके में बीमारियों से लड़ने के कई फायदेमंद गुण बताए गए हैं। प्राकृतिक चिकित्सा की भारतीय प्रणाली ‘आयुर्वेद’ के आधार-स्तंभ माने जाने वाले दो प्राचीन ग्रंथों ‘चरक संहिता’ और ‘सुश्रुत संहिता’ में इसके लाभकारी गुणों की चर्चा की गई है। इस पेड़ का हर भाग इतना लाभकारी है कि संस्कृत में इसको एक यथायोग्य नाम दिया गया है – “सर्व-रोग-निवारिणी” यानी ‘सभी बीमारियों की दवा।’ लाख दुखों की एक दवा!

इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य की शक्ति से ही चलता है…..सूर्य की ऊर्जा से जन्मे तमाम जीवों में नीम ने ही उस ऊर्जा को सबसे ज्यादा ग्रहण किया है। इसीलिए इसे रोग-निवारक समझा जाता है – किसी भी बीमारी के लिए नीम रामबाण दवा है। नीम के एक पत्ते में 150 से ज्यादा रासयानिक रूप या प्रबंध होते हैं। इस धरती पर मिलने वाले पत्तों में सबसे जटिल नीम का पत्ता ही है। नीम की केमिस्ट्री सूर्य से उसके लगाव का ही नतीजा है।
नीम के पत्तों में जबरदस्त औषधीय गुण तो है ही, साथ ही इसमें प्राणिक शक्ति भी बहुत अधिक है। अमेरिका में आजकल नीम को चमत्कारी वृक्ष कहा जाता है। दुर्भाग्य से भारत में अभी लोग इसकी ओर ध्यान नहीं दे हैं। अब वे नीम उगाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि नीम को अनगिनत तरीकों से इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर आपको मानसिक बिमारी है, तो भारत में उसको दूर करने के लिए नीम के पत्तों से झाड़ा जाता है। अगर आपको दांत का दर्द है, तो इसकी दातून का इस्तेमाल किया जाता है। अगर आपको कोई छूत की बीमारी है, तो नीम के पत्तों पर लिटाया जाता है, क्योंकि यह आपके सिस्टम को साफ कर के उसको ऊर्जा से भर देता है। अगर आपके घर के पास, खास तौर पर आपकी बेडरूम की खिड़की के करीब अगर कोई नीम का पेड़ है, तो इसका आपके ऊपर कई तरह से अच्छा प्रभाव पड़ता है।

बैक्टीरिया से लड़ता है नीम

दुनिया बैक्टीरिया से भरी पड़ी है। हमारा शरीर बैक्टीरिया से भरा हुआ है। एक सामान्य आकार के शरीर में लगभग दस खरब कोशिकाएँ होती हैं और सौ खरब से भी ज्यादा बैक्टीरिया होते हैं। आप एक हैं, तो वे दस हैं। आपके भीतर इतने सारे जीव हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इनमें से ज्यादातर बैक्टीरिया हमारे लिए फायदेमंद होते हैं। इनके बिना हम जिंदा नहीं रह सकते, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो हमारे लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। अगर आप नीम का सेवन करते हैं, तो वह हानिकारक बैक्टीरिया को आपकी आंतों में ही नष्ट कर देता है।

आपके शरीर के भीतर जरूरत से ज्यादा बैक्टीरिया नहीं होने चाहिए। अगर हानिकारक बैक्टीरिया की तादाद ज्यादा हो गई तो आप बुझे-बुझे से रहेंगे, क्योंकि आपकी बहुत-सी ऊर्जा उनसे निपटने में नष्ट हो जाएगी। नीम का तरह-तरह से इस्तेमाल करने से बैक्टीरिया के साथ निपटने में आपके शरीर की ऊर्जा खर्च नहीं होती।

आप नहाने से पहले अपने बदन पर नीम का लेप लगा कर कुछ वक्त तक सूखने दें, फिर उसको पानी से धो डालें। सिर्फ इतने से ही आपका बदन अच्छी तरह से साफ हो सकता है – आपके बदन पर के सारे बैक्टीरिया नष्ट हो जाएंगे। या फिर नीम के कुछ पत्तों को पानी में डाल कर रात भर छोड़ दें और फिर सुबह उस पानी से नहा लें ।

एलर्जी के लिए नीम

नीम के पत्तों को पीस कर पेस्ट बना लें, उसकी छोटी-सी गोली बना कर सुबह-सुबह खाली पेट शहद में डुबा कर निगल लें। उसके एक घंटे बाद तक कुछ भी न खाएं, जिससे नीम ठीक तरह से आपके सिस्टम से गुजर सके। यह हर प्रकार की एलर्जी – त्वचा की, किसी भोजन से होनेवाली, या किसी और तरह की – में फायदा करता है। आप सारी जिंदगी यह ले सकते हैं, इससे कोई नुकसान नहीं होगा। नीम के छोटे-छोटे कोमल पत्ते थोड़े कम कड़वे होते हैं, वैसे किसी भी तरह के ताजा, हरे पत्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

बीमारियों के लिए नीम

नीम के बहुत-से अविश्वसनीय लाभ हैं, उनमें से सबसे खास है – यह कैंसर-कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। हर किसी के शरीर में कैंसर वाली कोशिकाएं होती हैं, लेकिन वे एक जगह नहीं होतीं, हर जगह बिखरी होती हैं। किसी वजह से अगर आपके शरीर में कुछ खास हालात बन जाते हैं, तो ये कोशिकाएं एकजुट हो जाती हैं। छोटे-मोटे जुर्म की तुलना में संगठित अपराध गंभीर समस्या है, है कि नहीं? हर कस्बे-शहर में हर कहीं छोटे-मोटे मुजरिम होते ही हैं। यहां-वहां वे जेब काटने जैसे छोटे-मोटे जुर्म करते हैं, यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। लेकिन किसी शहर में अगर ऐसे पचास जेबकतरे एकजुट हो कर जुर्म करने लगें, तो अचानक उस शहर का पूरा माहौल ही बदल जाएगा। फिर हालत ये हो जाएगी कि आपका बाहर सड़क पर निकलना खतरे से खाली नहीं होगा। शरीर में बस ऐसा ही हो रहा है। कैंसर वाली कोशिकाएं शरीर में इधर-उधर घूम रही हैं। अगर वे अकेले ही मस्ती में घूम रही हैं, तो कोई दिक्कत नहीं। पर वे सब एक जगह इकट्ठा हो कर उधम मचाने लगें, तो समस्या खड़ी हो जाएगी। हमें बस इनको तोड़ना होगा और इससे पहले कि वे एकजुट हो सकें, यहां-वहां इनमें से कुछ को मारना होगा। अगर आप हर दिन नीम का सेवन करें तो ऐसा हो सकता है; इससे कैंसर वाली कोशिकाओं की तादाद एक सीमा के अंदर रहती है, ताकि वे हमारी प्रणाली पर हल्ला बोलने के लिए एकजुट न हो सकें। इसलिए नीम का सेवन बहुत लाभदायक है।

नीम में ऐसी भी क्षमता है कि अगर आपकी रक्त धमनियों(आर्टरी) में कहीं कुछ जमना शुरु हो गया हो तो ये उसको साफ कर सकती है। मधुमेह(डायबिटीज) के रोगियों के लिए भी हर दिन नीम की एक छोटी-सी गोली खाना बहुत फायदेमंद होता है। यह उनके अंदर इंसुलिन पैदा होने की क्रिया में तेजी लाता है।

साधना के लिए नीम

नीम आपके सिस्टम को साफ रखने के साथ उसको खोलने में भी खास तौर से लाभकारी होता है। इन सबसे बढ़ कर यह शरीर में गर्मी पैदा करता है। शरीर में इस तरह की गर्मी हमारे अंदर साधना के द्वारा तीव्र और प्रचंड ऊर्जा पैदा करने में बहुत मदद करती है।रोजाना नीम की चार-पांच कोमल पत्तियां चबाकर खाने से खून साफ होता है और कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों से बचाव होता है।
1. चेचक का इंफेक्शन होने पर नीम के पत्तों को पानी में उबालकर नहाने से लाभ होता है।
2. फोड़े-फुंसियों पर भी नीम के पत्तों का लेप लगाने से फायदा होता है।
3. नीम के पत्तों को पीसकर इसकी गोली सुबह-शाम शहद के साथ लेने से खून साफ होता है।
4. डायबिटीज के रोगी को नीम के पत्तों का रस पीने से लाभ होता है।
5. पेट में कीड़े होने पर नीम की नई व ताजा पत्तियों के रस में शहद मिलाकर चाटें।
6. दमे के मरीज को नीम के तेल की 20-25 बूंदे पान में डालकर खाने से राहत मिलती है।
7. नीम की सूखी पत्तियों का धुआं करने से घर में मौजूद बैक्टीरिया नष्ट होते हैं।
8. शरीर पर होने वाली खुजली, खाज और सोरायसिस में राहत के लिए नीम के पत्तों को उबालकर उससे नहाएं।

नीम एक आयुर्वेदिक दवाई है, जिसके कई सारे स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक फायदे हैं। नीम, हमारे शरीर, त्‍वचा और बालों के लिये बहुत फायदेमंद है। इसका कडुआ स्‍वाद बहुत से लोगो को खराब लगता है इसलिये वे इसे चाह कर भी नहीं खा पाते। इसी कारण नीम का रस पीना ज्‍यादा आसान होता है। आइये जानते हैं इस गुणकारी नीम के रस का फायदा। 

नीम का जूस कैसे पिएं? 

1. नीम का रस बहुत कडुआ होता है, जिसे पीना बहुत मुश्‍किल होता है। अगर आपको इसके फायदे चाहिये तो इसे एक ग्‍लास में डाल कर इसको दवा समझ कर पूरा एक साथ पी लें। इसके अलावा ये भी देखिये की नीम के रस को और किस-किसी प्रकार से पिया जा सकता है। नीम त्‍वचा के लिए अमृत होती है 
2. नीम के रस में थोड़ा मसाला डाल दें जिससे उसमें स्‍वाद आ जाए। इसको पीने से पहले उसमें नमक या काली मिर्च और या फिर दोनों ही डाल दें। 
3. कई लोगो को नीम की महक अच्‍छी नहीं लगती। इसलिये जब रस निकाल लें तब उसको फ्रिज में 15-20 मिनट के लिये रखें या फिर उसमें बर्फ के कुछ क्‍यूब डाल दें और फिर पिएं। लेकिन सबसे अच्‍छा होगा कि नीम के रस को निकाल कर तुरंत ही पी लिया जाए। इसको 30 मिनट से ज्‍यादा स्‍टोर कर के नहीं रखना चाहिये। 
4. नीक का रस पीने से पहले अपनी नाक को दबा लें, इससे जूस को पीने में आसानी होगी। अगर आपको नीम जूस का पूरा फायदा उठाना है, तो इसमें चीनी बिल्‍कुल भी न मिलाएं। 
5. नीम का रस हमेशा सुबह-सुबह पिएं। इसकी कडुआहट को कम करने के‍ लिये इसमें नमक मिलाएं और हल्‍का सा पानी भी।

बुधवार, जून 24, 2015

अनोखा है पानी से इलाज़ : राजेश मिश्रा

समय के अनुकूल पानी पीजिये निरोगी रहिये 

सुबह के समय ऐसे बहुत ही कम ही लोग हैं जो खाली पेट पानी पीते हों। पानी एक ऐसा तत्‍व है जो आपके शरीर की सारी बीमारियों को हर सकता है। क्‍या आप जानते हैं कि अगर आप सुबह के समय रोजाना खाली पेट पानी पियें तो आपकी कितनी बीमारियां दूर हो सकती हैं? कई सारी बीमारियां हमारे पेट से ही जन्‍म लेती हैं और अगर आप खाली पेट पानी पियेगें तो आप इस खतरे को काबू में करने का पहला कदम उठाएंगे। खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है. सबसे पहले आप हमेशा ये बात याद रखें कि शरीर मे सारी बीमारियाँ वात-पित्त और कफ के बिगड़ने से ही होती हैं ! क्‍या आप जानते हैं कि सुबह खाली पेट पानी पीने का चलन कहां से शुरु हुआ? यह चलन जापान के लोगों ने शुरु किया था। वहां के लोग सुबह होते ही, बिना ब्रश किये 4 गिलास पानी पी जाते हैं। इसके बाद वे आधा घंटे तक कुछ भी नहीं खाते।
यह वॉटर थैरेपी उन्‍हें स्‍वस्‍थ रखने में मदद करती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जापानी लोग विश्‍व के सबसे ऊर्जावान और कुशल लोगों में से एक हैं। सुबह खाली पेट पानी पीने के कई सारे लाभ हैं। अगर आप ऐसा करने की सोंच रहे हैं तो, कोशिश यही करें कि पानी हल्‍का सा गुनगुना हो, जिससे बाद में आप जो भी तैलिये पदार्थ खाएं, वह वसा के रूप मे शरीर में जम ना पाए। तो आइये जानते हैं कि सुबह खाली पेट पानी पीने से हमारे शरीर को कौन-कौन से लाभ पहुंचते हैं।
मेडिकल साइंस के अनुसार जिस प्रकार नहाने से शरीर के बाहर की सफाई होती है, ठीक उसी प्रकार पानी पीने से शरीर के अंदर की सफाई होती है। एक वयस्क पुरुष के शरीर में पानी उसके शरीर के कुल भार का लगभग 65 प्रतिशत और एक वयस्क स्त्री के शरीर में उसके शरीर के कुल भार का लगभग 52 प्रतिशत तक होता है।

आगे पढ़े कब और कितना जल पीना चाहिए को वो दवा का काम करे- राजेश मिश्रा 


1. दिन भर सांस लेने-छोड़ने में ही हम 2-3 कप पानी खर्च कर देते हैं। पसीने के अलावा, पेशाब के रूप में निकला पानी शरीर की गंदगी साफ करता है। अगर शरीर से करीब 10 फीसदी तरल पदार्थ कम हो जाएं तो डिहाइड्रेशन का खतरा रहता है। यही वजह है कि किडनी को दुरुस्त रखने के लिए भी बार-बार पानी पीना जरूरी है।

2. पतले लोगों के शरीर में ज्यादा पानी होता है, क्योंकि चर्बी (फैट) की तुलना में मांसपेशियों (मसल्स) में पानी धारण करने की क्षमता ज्यादा होती है। इसका मतलब साफ है कि सेहत और सौंदर्य के लिए पर्याप्त पानी की अहमियत बेहद ज्यादा है।

3. विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त पानी पीकर आप अपनी त्वचा को चमका सकते हैं और इससे आपका चेहरा भी दमकता नजर आने लगता है। पानी त्वचा का प्राकृतिक पोषक है। यह झुर्रियों से निजात दिलाता है और बेजान त्वचा में चमक पैदा कर देता है।

4. मौजूदा जीवन शैली में अक्सर लोग पानी पीने पर पूरा ध्यान नहीं देते। शरीर में पानी कम होने से सिर दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी, थकान और सोचने की शक्ति कम होने जैसी स्थितियां बनने लगती हैं और कई लोगों को काम के दौरान इस बात का आभास ही नहीं हो पाता।

5. भोजन करने के 30 मिनट पहले 2 गिलास पानी पीने से पाचन शक्ति बढ़ती है। सुबह उठने के बाद 1 गिलास पानी पीने से आपके अंदरूनी अंग मजबूत होते हैं।

6. पानी हमें गर्मी से बचाता है। अगर आप जरूरत के हिसाब से पानी नहीं पिएंगे तो आपके शरीर का तापमान घातक तरह से बढ़ सकता है। सही तरह से पानी न पीने से शरीर की काम करने की गति घट जाती है, थकान दूर हो जाती है व मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ने लगता है।

7. भोजन को पचाने के लिए हमारा पेट एंजाइम का उत्पादन करता है, जो एसिडिक होते हैं। इसलिए जब तक ठीक मात्रा में पानी नहीं पिएंगे, तब तक आपका पेट ठीक नहीं रहेगा और पेट में एसिड बनता रहेगा।

8. जो लोग ज्यादा पानी पीते है उनको पथरी होने की संभावना न के बराबर होती है। ज्यादा पानी पीने से शरीर में हानिकारक तत्वों का निष्कासन पसीने और मूत्र के द्वारा हो जाता है।

9. सोने से पहले 1 गिलास पानी पीने से आप हार्ट अटैक जैसी परेशानी से बच सकते हैं। नहाने के बाद 1 गिलास पानी पीने से कभी लो ब्लड प्रेशर की शिकायत नहीं होती है।

मंगलवार, जून 23, 2015

यौनशक्ति और कामशक्ति बढ़ाने के उपाय

लिंग में कड़ापन और वीर्य गाढ़ा करने के सरल नुस्खे 

Enjoy married life must adopt it

यौन-संबध बनाने के लिए जितना ध्यान मानसिक तैयारी और कामात्तेजना को देना चाहिए उतना ही ध्यान अपनी यौन-शाक्ति पर भी देना आवश्यक है। यौन-शक्ति के अभाव मे एक बेहतरीन रोमांटिक माहौल में भरपूर तैयारी के साथ बनाया गया संबंध कारगर साबित नही होता है और आप यौन-सुख से वंचित रह जाते है। जिन व्यक्तियों में यौन-शक्ति का अभाव होता है वह सेक्स के दौरान थो़डी देर मे ही खुद को कमजोर महसूस करने लगते है। इस अभाव के कारण अधिकतर लोगो में शामिदंर्गी का बोध बढ़ जाता है और वह अपने साथी के साथ यौन-संबंध बनाने मे झिझकने लगते है। हाल ही मे वैज्ञानिको द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार यह पाया गया है कि शारीरिक रूप से कमजोर और अस्वस्थ लोगो मे यौन-शक्ति की कमी होने की संभावना अधिक होती है। आइए इसके अन्य कारणो तथा निवारणो पर विचार करते है यौन-शक्ति क्षीण होने के कारण
डिपरेशन: बहुत अधिक तनाव से होने वाले हार्मोनल परिवर्तन, पौष्टिक विकार, यौन-शाक्ति कम करने के मुख्य कारणों मे से एक है।
भारी व जटिल व्यायाम: आवश्यकता से अधिक भारी-भरकम व्यायामो का प्रशिक्षण शरीर मे उपस्थित आवश्यक वसा को कम कर देता है, जिसका असर शरीर मे जरूरी मेटाबोलिजम तथा अन्य हार्मोनो पर प़डता है और यौन-शक्ति मे कमी आने लगती है आहार: गर्म तथा अधिक मसालेदार आहर का प्रयोग भी इसका एक कारण है

शराब का दुरूपयोग: शराब-सिगरेट तथा तंबाकु के अत्याधिक सेवन से जननांग की कोशिकाए शीथल प़ड जाती है। जो यौन-शक्ति कमजोर होने का मुख्य कारण है। एक लौंग को चबाकर उसकी लार को लिंग के पिछले भाग पर लगाने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
लगभग 10-10 ग्राम सफेद प्याज का रस और शहद, 2 अंडे की जर्दी और 25 मिलीलीटर शराब को एक साथ मिलाकर रोजाना शाम के समय लेने से संभोगशक्ति बढ़ जाती है।
लगभग 5 बादाम की गिरी, 7 कालीमिर्च और 2 ग्राम पिसी हुई सोंठ तथा जरूरत के अनुसार मिश्री को एक साथ मिलाकर पीस लें और फंकी लें। इसके ऊपर से दूध पी लें। इस क्रिया को कुछ दिनों तक नियमित रूप से करने से संभोगक्रिया के समय जल्दी वीर्य निकलने की समस्या दूर हो जाती है।
उड़द की दाल को पानी में पीसकर पिट्ठी बनाकर कढ़ाई में लाल होने तक भून लें। इसके बाद गर्म दूध में इस पिसी हुई दाल को डालकर खीर बना लें। अब इसमें मिश्री मिलाकर किसी कांसे या चांदी की थाली में परोसकर सेवन करने से संभोग करने की शक्ति बढ़ जाती है। इस खीर को लगभग 40 दिनों तक प्रयोग करने से लाभ होता है।

वीर्य को बढ़ाना

  • इमली के बीजों को पानी में छिलका उतरने तक भिगो लें। इसके बाद इन बीजों का छिलका उतारकर चूर्ण बना लें। इसके लगभग आधा किलो चूर्ण में इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर रख लें। इसमें से लगभग 2 ग्राम चूर्ण को लगभग 40 दिनों तक नियमित रूप से फांकने के बाद ऊपर से दूध पीने से वीर्य गाढ़ा होता है और शीघ्रपतन की शिकायत दूर हो जाती है।
  • बरगद के पके हुए फलों को छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें और इसमें मिश्री मिलाकर रख लें। इस चूर्ण को 5 ग्राम की मात्रा में रोजाना शाम को दूध के साथ लेने से एक सप्ताह के बाद ही वीर्य गाढ़ा होना शुरू हो जाता है। इस चूर्ण को लगभग 40 दिनों तक सेवन किया जा सकता है।
  • लगभग आधा किलो देशी फूल की कच्ची कलियों को डेढ़ लीटर पानी में डालकर उबाल लें। पानी उबलने के बाद जल जाने पर इस मिश्रण को बारीक पीसकर 5-5 ग्राम की गोलियां बनाकर एक कांच के बर्तन में रखकर ऊपर से ढक्कन लगा दें। इसमें से 1 गोली को रोजाना सुबह के समय दूध के साथ लेने से संभोग करने की शक्ति बढ़ती है और वीर्य भी मजबूत होता है।
  • लगभग 10 ग्राम बिदारीकंद के चूर्ण को गूलर के रस में मिलाकर चाट लें। इसके ऊपर से घी मिला हुआ दूध पीने से जो व्यक्ति संभोग क्रिया में पूरी तरह से सक्षम नहीं होते उनके शरीर में भी यौन शक्ति का संचार होने लगता है।
  • देशी फूल की तुरंत उगी अर्थात नई कोंपलों को सुखाकर और पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को रोजाना 6 ग्राम की मात्रा में फांककर ऊपर से मिश्री मिला हुआ दूध पीने से वीर्य पुष्ट होता है। इसके अलावा इसका सेवन करने से पेशाब के साथ वीर्य का आना और स्वप्नदोष जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।
  • चिरौंजी, मुलहठी और दूधिया बिदारीकंद को बराबर मात्रा में एक साथ मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को लगभग 1 सप्ताह तक लेने से और ऊपर से दूध पीने से वीर्य के सारे दोष दूर होते हैं और वीर्य बढ़ जाता है।
  • सोंठ, सतावर, गोरखमुंडी, थोड़ी सी हींग और देशी खांड को एक साथ मिलाकर सेवन करने से लिंग मजबूत और सख्त होता है और बुढ़ापे तक ऐसा ही रहता है। इसके अलावा इसको लेने से वीर्य बढ़ता है और शीघ्रपतन जैसे रोग दूर हो जाते हैं। इस चूर्ण का सेवन करते समय गुड़ और खट्टे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • सिंघाड़े के आटे का हलुआ, उड़द और चने की दाल का हलुआ, अंडों की जर्दी का गाय के घी में तैयार किया हुआ हलुआ, मेथी और उड़द की दाल के लडडू, आंवले की चटनी, गेहूं, चावल, बराबर मात्रा में जौ और उड़द का आटा और उसमें थोड़ी सी पीपल को डालकर तैयार की गई पूडि़यां और नारियल की खीर आदि का सेवन करने से हर तरह के धातु रोग नष्ट हो जाते हैं, वीर्य पुष्ट होता है और संभोग करने की शक्ति बढ़ती है।

लिंग को मजबूत करना

  1. सुअर की चर्बी और शहद को बराबर मात्रा में एक साथ मिलाकर लिंग पर लेप करने से लिंग में मजबूती आती है।
  2. हींग को देशी घी में मिलाकर लिंग पर लगा लें और ऊपर से सूती कपड़ा बांध दें। इससे कुछ ही दिनों में लिंग मजबूत हो जाता है।
  3. भुने हुए सुहागे को शहद के साथ पीसकर लिंग पर लेप करने से लिंग मजबूत और शक्तिशाली हो जाता है।
  4. जायफल को भैंस के दूध में पीसकर लिंग पर लेप करने के बाद ऊपर से पान का पत्ता बांधकर सो जाएं। सुबह इस पत्ते को खोलकर लिंग को गर्म पानी से धो लें। इस क्रिया को लगभग 3 सप्ताह करने से लिंग पुष्ट हो जाता है।
  5. शहद को बेलपत्र के रस में मिलाकर लेप करने से हस्तमैथुन के कारण होने वाले विकार दूर हो जाते हैं और लिंग मजबूत हो जाता है।
  6. रीठे की छाल और अकरकरा को बराबर मात्रा में लेकर शराब में मिलाकर खरल कर लें। इसके बाद लिंग के आगे के भाग को छोड़कर लेप करके ऊपर से ताजा साबुत पान का पत्ता बांधकर कच्चे धागे से बांध दें। इस क्रिया को नियमित रूप से करने से लिंग मजबूत हो जाता है।
  7. बकरी के घी को लिंग पर लगाने से लिंग मजबूत होता है और उसमें उत्तेजना आती है।
  8. बेल के ताजे पत्तों का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर लगाने से लिंग में ताकत पैदा हो जाती है।
  9. धतूरा, कपूर, शहद और पारे को बराबर मात्रा में मिलाकर और बारीक पीसकर इसके लेप को लिंग के आगे के भाग (सुपारी) को छोड़कर बाकी भाग पर लेप करने से संभोग शक्ति तेज हो जाती है।
  10. असगंध, मक्खन और बड़ी भटकटैया के पके हुए फल और ढाक के पत्ते का रस, इनमें से किसी भी एक चीज का प्रयोग लिंग पर करने से लिंग मजबूत और शक्तिशाली बनता है।
  11. पालथ लंगी का तेल, सांडे का तेल़, वीर बहूटी का तेल, मोर की चर्बी, रीछ की चर्बी, दालचीनी का तेल़, आधा भाग लौंग का तेल, 4 भाग मछली का तेल को एकसाथ मिलाकर कांच के चौड़े मुंह में भरकर रख लें। इसमें से 8 से 10 बूंदों को लिंग पर लगाकर ऊपर से पान के पत्ते को गर्म करके बांध लें। इस क्रिया को लगातार 1 महीने तक करने से लिंग का ढीलापन समाप्त हो जाता है़, लिंग मजबूत बनता है। इस क्रिया के दौरान लिंग को ठंडे पानी से बचाना चाहिए।

जानकारी

लिंग की मालिश या लेप करते समय एक बात का ध्यान रखें कि लिंग के मुंह के नीचे सफेद रंग का बदबूदार मैल जमा हो जाता है। इस मैल को समय-समय ठंडे पानी से धोकर साफ करते रहने चाहिए।

यौन-शक्ति बढ़ाने के प्रभावी घरेलु उपाय:

1) लहुसन:- कच्चे लहसुन की 2-3 कलियो का प्रतिदिन सेवन करना यौन-शाक्ति बढ़ाने का बेहतरीन घरेलु उपचार है
2) प्याज:- लहसुन के बाद प्याज एक और कारगर उपाय है। सफेद कच्चे प्याज का प्रयोग अपने नित्य आहार मे करें
3) काले चने:- काले-चने से बने खाद्य-पदार्थ जैसे डोसा आदि का हफ्ते मे 2-3 बार प्रयोग काफी लाभकारी होता है
4) गाजर:- 150 ग्राम बारीक कटी गाजर को एक उबले हुए अंडे के आधे हिस्से मे एक चम्मच शहद मिलाकर दिन में एक बार सेवन करे। इसका प्रयोग लगातार 1-2 महीने तक करें
5) भिंडी:- प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार 5-10 ग्राम भिंडी की ज़ड के पाउडर को एक गिलास दूध तथा दो चम्मच मिश्री मे मिलाकर नित्य सेवन करने से आपकी यौन-शक्ति कभी कम नही प़डेगी
6) सफे द मूसली:- यूनानी चिकित्सा के अनुसार सफेद मूसली का प्रयोग भी बेहद लाभदायक होता है। 15 ग्राम सफेद मूसली को एक कप दूध मे उबालकर दिन मे दो बार पीने से यौन-शक्ति बढ़ती है।
7) सहजन:- 15 ग्राम सहजन के फूलो को 250 मिली दूध मे उबालकर सूप बनाए। यौन-टौनिक के रूप मे इसका सेवन करे
8) अदरक:- आधा चम्मच अदरक का रस, एक चम्मच शहद तथा एक उबले हुए अंडे का आधा हिस्सा, सभी को मिलकार मिश्रण बनाए प्रतिदिन रात को सोने से पहले एक महीने तक सेवन करे
9) खजूद:- बादाम, पिस्ता खजूर तथा श्रीफल के बीजो को बराबर मात्रा मे लेकर मिश्रण बनाए। प्रतिदिन 100 ग्राम सेवन करे
10) किशमिश:- 30 ग्राम किशमिश को गुनगुने पानी मे धोए, 200 मिली दूध मे उबाले तथा दिन मे तीन बार सेवन करे। ध्यान रखिए की प्रत्येक बार ताजा मिश्रण तैयार करे। धीरे धीरे 30 ग्राम किशमिश की मात्रा को 50 ग्राम तक करें।
11) ताजे फलो का सेवन:- यौन-शक्ति कमजोरी से पीडित रोगियो को शुरू में 5-5 घंटे के अंतराल से विशेष रूप से ताजा फलो का आधार लेना चाहिए उसके बाद वह पुन: अपनी नियमित खुराक धीरे-धीरे प्रारंभ कर सकते है। रोगी को धूम्रपान , शराब चाय तथा कॉफी के सेवन से बचना चाहिए, और विशेष रूप से सफेद चीनी तथा मैदे या उनसे बने उत्पादो का परहेज करना चाहिए।

यौन-शाक्ति बढ़ाने के अन्य उपाय:-

1) मालिश: सारे शरीर पर एक जोरदार मालिश, शरीर की सुस्त प़डी मांसपेशियो तथा तंत्रिकाओ को ऊर्जा प्रदान कर पुन:जीवित करने मे मदद करती है।
2) ठंडा हिप स्त्रान: यौन अंगो की नसे श्रोणि क्षेत्र से नियत्रिंत होती है, इसलिए सुबह या शाम को दस मिनट के लिए ठंडा हिप स्त्रान अवश्य ले।
3) योगासन: योगा, ध्यान और ऎसी कई अन्य सकारात्मक ऊर्जा तकनीकियों का प्रयोग करे जो आपके दिमाग को तनाव से मुक्त करता है तथा यौन ऊर्जा बढ़ाता है। द्रोणासन, सर्वागआसन, हलासन जैसे योगसान यौन-शक्ति बढ़ाने मे अत्यधिक लाभदायक होते है।
4) अंतराल: सेक्स दैनिस दिनचर्या का अभिन्न अंग है, हो सकता है कि आप इससे उबाऊ महसूस करने लगे इसलिए यौन-संबंध रोजाना ना बनाए, एक या दो दिन का अंतराल अवश्य रखे।
5) मुद्राऎं : सेक्स भी एक कला है जिसे हमारी ऎतिहासिक पुस्तको मे विस्तार से समझाया गया है, जिस प्रकार नृत्यकला की मुद्राए होती है। उसी प्रकार यौन क्रियाओं क भी विभिन्न मुद्राऎं होती है। नित्य नई मुद्राओं का प्रयोग आपके यौन-जीवन मे नयेपन के साथ-साथ आपको फिट भी रखेगा। किसी मनोचिकित्सक की सलाह अवश्य ले इस बात का विशेष ध्यान रखिए कि आपक कोई भी उपाय चुने परन्तु उसका पूरी नियमितता के साथ प्रयोग करे ये अवश्य लाभदायक सिद्ध होगा और आप अपने यौन-जीवन को और अधिक सुखमय बना पायेगे।

गुरुवार, जून 18, 2015

आँखों के लिए रामबाण है गोरखमुंडी

जिन की आंखे कमजोर हैं, जिन्हे नजदीक या दूर का चश्मा लगा हुआ है वह यह प्रयोग करे : राजेश मिश्रा

ये सभी प्रयोग अनेक बार आजमाए हुए व सुरक्षित हैं। किसी को भी कोई हानी नहीं होगी। लाभ किसी को कम व किसी को अधिक हो सकता है परंतु लाभ सभी को होगा। हो सकता है किसी का चश्मा न उतरे परंतु चश्मे का नंबर जरूर कम होगा। प्रयोग करने से सिर मे दर्द नहीं होगा। बाल दोबारा काले हो जाएगे। बाल झड़ने रूक जाएगे।
खाने की दवाई- गोरखमुंडी एक एसी औषधि है जो आंखो को जरूर शक्ति देती है। अनेक बार अनुभव किया है। आयुर्वेद मे गोरखमुंडी को रसायन कहा गया है। आयुर्वेद के अनुसार रसायन का अर्थ है वह औषधि जो शरीर को जवान बनाए रखे।

प्रयोग विधि- 

1- गोरखमुंडी का पौधा यदि यह कहीं मिल जाए तो इसे जड़ सहित उखाड़ ले। इसकी जड़ का चूर्ण बना कर आधा आधा चम्मच सुबह शाम दूध के साथ प्रयोग करे । (इसका चित्र गुगुल पर देखे)
2- बाकी के पौधे का पानी मिलाकर रस निकाल ले। इस रस से 25% अर्थात एक चौथाई घी लेकर पका ले। इतना पकाए कि केवल घी रह जाए। यह भी आंखो के लिए बहुत गुणकारी है।
3- बाजार मे साबुत पौधा या जड़ नहीं मिलती। केवल इसका फल मिलता है। वह प्रयोग करे।

प्रयोग विधि-

100 ग्राम गोरखमुंडी लाकर पीस ले। बहुत आसानी से पीस जाती है। इसमे 50 ग्राम गुड मिला ले। कुछ बूंद पानी मिलाकर मटर के आकार की गोली बना ले।
यह काम लौहे कि कड़ाही मे करना चाहिए । न मिले तो पीतल की ले। यदि वह भी न मिले तो एल्योमीनियम कि ले। जो अधिक गुणकारी बनाना चाहे तो ऐसे करे। 300 ग्राम गोरखमुंडी ले आए। लाकर पीस ले । 100 ग्राम छन कर रख ले। बाकी बची 200 ग्राम गोरखमुंडी को 500 ग्राम पानी मे उबाले। जब पानी लगभग 300 ग्राम बचे तब छान ले। साथ मे ठंडी होने पर दबा कर निचोड़ ले। इस पानी को मोटे तले कि कड़ाही मे डाले। उसमे 100 ग्राम गुड कूट कर मिलाकर धीमा धीमा पकाए। जब शहद के समान गाढ़ा हो जाए तब आग बंद कर दे। जब ठंडा जो जाए तो देखे कि काफी गाढ़ा हो गया है। यदि कम गाढ़ा हो तो थोड़ा सा और पका ले। फिर ठंडा होने पर इसमे 100 ग्राम बारीक पीसी हुई गोरखमुंडी डाल कर मिला ले। अब 50 ग्राम चीनी/मिश्री मे 10 ग्राम छोटी इलायची मिलाकर पीस ले। छान ले। हाथ को जरा सा देशी घी लगा कर मटर के आकार कि गोली बना ले। गोली बना कर चीनी इलायची वाले पाउडर मे डाल दे ताकि गोली सुगंधित हो जाए। 3 दिन छाया मे सुखाकर प्रयोग करे। इलायची केवल खुशबू के लिए है।

प्रयोग विधि –

1-1 गोली 2 समय गरम दूध से हल्के गरम पानी से दिन मे 2 बार ले। सर्दी आने पर 2-2 गोली ले सकते हैं। इसका चमत्कार आप प्रयोग करके ही अनुभव कर सकते हैं। आंखे तो ठीक होंगी है रात दिन परिश्रम करके भी थकावट महसूस नहीं होगी। कील, मुहाँसे, फुंसी, गुर्दे के रोग सिर के रोग सभी मे लाभ करेगी। जिनहे पेशाब कम आता है या शरीर के किसी हिस्से से खून गिरता है तो ठंडे पानी से दे। इतनी सुरक्षित है कि गर्भवती को भी दे सकते हैं। ध्यान रहे 2-4 दिन मे कोई लाभ नहीं होगा। लंबे समय तक ले । गोली को अच्छी तरह सूखा ले। अन्यथा अंदर से फफूंद लग जाएगी।
ध्यान रहे- ये पाचन शक्ति बढ़ाती है इसलिए भोजन समय पर खाए। चाय पी कर भूख खत्म न करे। चाय पीने से यह दवाई लाभ के स्थान पर हानि करेगी।
प्रायः निम्नलिखित कारणों से नेत्ररोग उत्पन्न होते हैं -
Gorakhmundi ka Sukha Bij (Phal)

  • मल, मूत्र अपानवायु के वेगों को रोकना ।
  • प्रातः और सायं दोनों समय शौच न जाना ।
  • सूर्योदय के पश्चात् शौच जाना ।
  • मूत्र में प्रतिविम्ब देखना ।
  • गर्मी वा धूप से संतप्त (गर्म) होकर तुरन्त ही शीतल जल में घुसना ।
  • उष्ण वा गन्दे जल में स्नान करना वा उष्ण (गर्म) जल सिर पर डालना ।
  • अग्नि का अधिक सेवन तथा उसके पास बैठना वा अग्नि पर पैर तलवे आदि सेकना ।
  • नेत्रों में धूल वा धुंआं जाना ।
  • नींद आने पर वा समय पर न सोना वा दिन में सोना ।
  • सूर्य के उदय और अस्त होते समय सोना ।
  • धूल, धुएं के स्थान वा अधिक उष्ण प्रदेशों में रहना वा सोना ।
  • वमन (उल्टी) का वेग रोकना वा अधिक वमन करना ।
  • शोक, चिन्ता और क्रोधजन्य कष्ट और सन्ताप ।
  • अधिक वा बहुत दिनों तक रोना ।
  • माथा, सिर अथवा चक्षुओं पर चोट आदि लगना ।
  • अधिक उपवास करना, भूखा रहना वा भूख को रोकना ।
  • अत्यन्त शीघ्रगामी (चलने वाले) यानों पर सवारी करना वा बैठना ।
  • अधिक खट्टे रसों (इमली आदि), चपरे (लाल मिर्च आदि), शुष्क पदार्थ (आलू आदि), अचार, तेल के पदार्थ, गर्म मसाले, गुड़, शक्कर, लहसुन, प्याज, बैंगन आदि उष्ण पदार्थों का सेवन ।
  • पतले पदार्थों को अधिक खाना अथवा गले, सड़े, दुर्गन्धयुक्त शाक, सब्जी और फल खाना ।
  • मांस, मछली, अण्डे आदि अभक्ष्य पदार्थों को खाना ।
  • मद्य (शराब), सिगरेट, हुक्का, बीड़ी, चाय, पान, भांग आदि मादक
  • छोटे-छोटे अक्षरों की वा अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें रात्रि वा दिन में भी अधिक पढ़ना ।
  • सूर्य उदय व अस्त होते समय पढ़ना ।
  • सूर्यास्त के बाद बिना दीपक आदि के प्रकाश के पढ़ना अथवा सूई से सीना आदि बारीक कार्य करना ।
  • चन्द्रमा के प्रकाश में पढ़ना अथवा कपड़े आदि सीने का बारीक काम करना ।
  • रात्रि में लिखाई का काम करना ।
  • फैशन के कारण (सुन्दर बनने के लिए) आंखों पर नयनक वा चश्मे धारण करना ।
  • दुखती हुई आंखों से पढ़ना और सूर्य की ओर देखना ।
  • सुलाने के लिए बच्चों को अफीम खिलाना ।
  • बिजली, बैट्री, अग्नि, पानी, शीशे की चमक को देखना ।
  • सूर्य के प्रतिबिम्ब को शीशे में देखना ।
  • अधिक भोजन करना ।
  • जुराब पहनकर या बन्द मकान में सोना ।
  • दुखती हुई आंखों में चने चबाना अथवा अग्नि के सम्मुख बैठना वा देखना, धूल व धूएं में तथा धूप में (हल आदि का) कठिन काम करना ।
  • सूर्यग्रहण के समय सूर्य की ओर देखना ।
  • इन्द्रधनुष की ओर देखना ।
  • ऋतुओं और अपनी प्रकृति के प्रतिकूल आहार वयवहार (भोजन-छादन) करना ।

गृहस्थ ध्यान से पढ़ें

  • दुखती हुई आंखों में विषय भोग (वीर्यनाश) करने से आंखें सदा के लिए बिगड़ जाती हैं । यहां तक कि अन्धा हो जाने तक का भय है ।
  • रजस्वला स्त्री के शीशे में मुख देखने तथा आंखों में सुर्मा, स्याही, अञ्जन आदि डालने से अन्धा बालक उत्पन्न होता है ।
  • गर्भवती स्त्री के उष्ण, चरपरे, शुष्क, मादक (नशीले) पदार्थों के सेवन तथा विषयभोग से उत्पन्न होने वाले बालक की आंखें बहुत दुखती हैं तथा उसे अन्य रोग भी हो जाते हैं ।

नेत्र-रक्षा के साधन

यदि आंखों से प्यार है तो पूर्वलिखित निषिद्ध आहार व्यवहार से सदैव बचे रहो तथा निम्नलिखित नेत्र-रक्षा के उपायों (साधनों) का श्रद्धा से सेवन करो । प्रत्येक उपाय हितकर है किन्तु यदि सभी उपायों का एक साथ प्रयोग करें तो सोने पर सुहागा है ।

चक्षु स्नान

प्रातःकाल चार बजे उठकर ईश्वर का चिन्तन करो । फिर शुद्ध जल, जो ताजा और वस्त्र से छना हुआहो, लेकर इससे मुख को इतना भर लो कि उसमें और जल न आ सके अर्थात् पूरा भर लो । इस जल को मुख में ही रखना

है, साथ ही दूसरे शुद्ध जल से दोनों आंखों में बार-बार छींटे दो जिससे रात्रि में शयन समय जो मैल अथवा उष्णता आंखों में आ जाती है वह सर्वथा दूर हो जाय । इस प्रकार इस क्रिया से अन्दर और बाहर दोनों ओर से चक्षु इन्द्रिय को ठंडक पहुंचती है । निरर्थक मल और उष्णता दूर होकर दृष्टि बढ़ती है । इस क्रिया को प्रतिदिन करना चाहिये ।

उषः पान


इसके पश्चात् कुल्ली करके मुख नाक आदि को साफ कर लो और नाक के एक वा दोनों छिद्रों द्वारा ही आठ दस घूंट जल पी लो और लघुशंका करके शौच चले जाओ । नाक के द्वारा जल पीने से जहां अजीर्ण (कोष्ठबद्धता) दूर होकर शौच साफ होता है वहां यह क्रिया अर्श (बवासीर), प्रमेह, प्रतिश्याय (जुकाम) आदि रोगों से बचाती और आंखों की ज्योति को बढ़ाती है ।
शौच प्रतिदिन दूर जंगल में प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में नंगे पैर (बिना जूते पहने) जाओ । भ्रमण वा शौच के समय जूता, जुराब, खड़ाऊं और चप्पल आदि कुछ भी न पहनो । शीत, ग्रीष्म, वर्षा सभी ऋतुओं में नंगे पैरों भ्रमण करने से सब प्रकार के नेत्ररोग नष्ट होकर नेत्रज्योति बढ़ती है । किन्तु भ्रमण से अभिप्राय गन्दी गलियों से नहीं है । भ्रमण का स्थान शुद्ध हो । नंगे पैर ओस पड़ी हुई घास पर घूमना तो अत्यन्त ही लाभदायक है । सायंकाल सूर्यास्त के पश्चात् भी नंगे पैर जंगल में भ्रमण करना आंखों के लिए लाभदायक है ।

प्रातःकाल और सायंकाल हरी घास देखो । फसल, वृक्षों तथा पादपों को देखने से चक्षुदृष्टि बढ़ती है । हरे भरे उद्यानों में यदि कोई दुखती हुई आंखों में भी भ्रमण करे तो उनमें भी लाभ होता है । हरी वस्तुओं को देखने से चक्षुविकार नष्ट होकर नेत्रज्योति बढ़ती है यह बात साधारण लोग भी जानते हैं । प्राचीन महर्षियों की यह बात कितनी रहस्यपूर्ण है ! ब्रह्मचारी के लिए प्रत्येक ऋतु में नंगे सिर रहना यही सिद्ध करता है कि प्रकृति माता की गोद में ब्रह्मचारी के

सब अंग-प्रत्यंगों की, सब ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की स्वाभाविक दृष्टि (उन्नति) होकर वह आजीवन रोगरहित और स्वस्थ रहे ।
दन्तधावन

शौच से निवृत होकर दातुन अवश्य करो । यही नहीं कि दातुन से दांत ही निर्मल, दृढ़ और स्वस्थ होते हैं अपितु प्रतिदिन दन्तधावन करनेवालों की आंखें सौ वर्ष तक रोगरहित रहती हैं । जब मुख में दातुन डालकर मुख साफ करते हैं तो उसी समय आंखों में से जल के रूप में मल निकलता है जिससे आंखों की ज्योति बढ़ती है ।

चक्षुधावन

दातुन के पश्चात् कुल्ला करके एक खुले मुंह का जलपात्र लें और उसको ऊपर तक शुद्ध जल में भर लें । उसमें अपनी दोनों आंखों को डुबोवें और बार-बार आंखों को जल के अन्दर खोलें और बन्द करें । इस प्रकार कुछ देर तक चक्षुस्नान करने से आंखों को बहुत ही लाभ होगा । इस चक्षुस्नान की क्रिया को किसी शुद्ध और निर्मल जल वाले सरोवर में भी किया जा सकता है । यह ध्यान रहे कि मिट्टी, धूल आदि मिले हुए जल में यह क्रिया कभी न करें, नहीं तो लाभ के स्थान पर हानि ही होगी ।

जलनेति सं० १

शुद्ध, शीतल और ताजा जल लेकर शनैः शनैः नासिका के दोनों द्वारों से पीयें और मुंह से निकाल दें । दो-चार बार इस क्रिया को करके नाक और मुंह को साफ कर लो ।

जलनेति सं० २

किसी तूतरीवाले (टूटीदार) पात्र में जल लें और टूटी को बायें नाक में लगायें । बायें नाक को थोड़ा सा ऊपर को कर लें और दायें को नीचे को झुकायें और मुख से श्वास लें । बायें नासिका द्वार में डाला हुआ जल दक्षिण नासिका
के छिद्र से स्वयं निकलेगा । इसी प्रकार दायें नाक में डालकर बायें से निकालो । यह ध्यान रहे कि बासी और शीतल जल से नेति कभी न करें । उष्ण जल का भी प्रयोग नेति में कभी न करें । आरम्भ में इस क्रिया को थोड़ी देर करो, फिर शनैः शनैः बढ़ाते चले जाओ । यह क्रिया आंखों की ज्योति के लिये इतनी लाभदायक है कि इसका निरन्तर श्रद्धापूर्वक दीर्घकाल तक अभ्यास करने से ऐनकों की आवश्यकता नहीं रहती । चश्मे उतारकर फेंक दिये जाते हैं । कोई सुरमा, अंजन आदि औषध इससे अधिक लाभदायक नहीं । जहां यह क्रिया चक्षुओं के लिए अमृत संजीवनी है, वहां यह प्रतिश्याय (जुकाम) को भी दूर भगा देती है । जो भी इसे जितनी श्रद्धापूर्वक करेगा उतना ही लाभ उठायेगा और ऋषियों के गुण गायेगा ।

जलनेति से किसी प्रकार की हानि नहीं होती । यह मस्तिष्क की उष्णता और शुष्कता को भी दूर करती है । सूत्रनेति (धागे से नेति करना) शुष्कता लाती है किन्तु जलनेति से शुष्कता दूर होती है । सूत्रनेति इतनी लाभदायक नहीं जितनी कि जलनेति । जलनेति से तो मस्तिष्क अत्यन्त शुद्ध, निर्मल और हल्का हो जाता है । इससे और भी अनेक लाभ हैं ।

जलनेति सं० ३

जलनेति का एक दूसरा प्रकार भी है –

मुख को जल से पूर्ण भर लो और खड़े होकर सिर को थोड़ा सा आगे झुकाओ और शनैः शनैः नासिका द्वारा श्वास को बाहर निकालो । वायु के साथ जल भी नाक के द्वारा निकलने लगेगा । जिह्वा के द्वारा भी थोड़ा सा जल को धक्का दें । इस प्रकार अभ्यास से जल दो-चार दिन में नाक से निकलने लगेगा । इस क्रिया से भी उपरोक्त जलनेति वाले सारे लाभ होंगे । किसी प्रकार का मल भी मस्तिष्क में न रहेगा । आंखों के सब प्रकार के रोग दूर होकर ज्योति दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली जावेगी । इसके पश्चात् शुद्ध शीतल जल से

स्नान करें । पहले जल सिर पर डालें । जब सिर खूब भीग जाय तो फिर अन्य अंगों पर डालें । नदी में स्नान करना हो तो भी पहले सिर धो लें ।
अन्य उपाय सं० २

(१) स्नान के समय सिर से पहले पैरों को शीतल जल से कभी न धोवो । यदि स्नान करते समय पांवों को पहले भिगोवोगे तो नीचे की उष्णता मस्तिष्क में चढ़ जायेगी । यह ध्यान रक्खो कि सदैव शीतल जल से स्नान करो और सिर पर शीतल जल खूब डालो । यदि दुर्भाग्यवश रुग्णावस्था में उष्ण जल से नहाना पड़े तो पहले पैरों पर डालो । सिर को ठंडे जल से ही धोवो । नाभि के नीचे मसाने और मूत्रेन्द्रिय पर भी उष्ण जल कभी मत डालो

(२) सिर में किसी प्रकार का मैल न रहने पाये ।

(३) निरर्थक फैशन के पागलपन में सिर पर बड़े-बड़े बाल न रक्खो । इनमें धूल आदि मैल जम जाता है और स्नान भी भली-भांति नहीं हो सकता । बालों से मस्तिष्क, बुद्धि और आंखें खराब होती हैं । उष्ण प्रदेश और उष्णकाल में बाल अत्यन्त हानिकारक हैं । अतः इस बला से बचे रहो जिससे कि स्नान का लाभ शरीर और चक्षुओं को पूर्णतया पहुंच सके ।

(४) शुद्ध सरोवर वा नदी में नहाने वा तैरने से भी चक्षुओं को बड़ा ही लाभ होता है । स्नान का स्नान और व्यायाम का व्यायाम । पर्याप्‍त समय शुद्ध जल में प्रतिदिन तैरने से चक्षु और वीर्यसम्बन्धी सभी रोग दूर हो जाते हैं । तैरने के समय चक्षुस्नान के लिए भी बड़ी सुविधा है । किन्तु जल निर्मल हो । यदि नदी और सरोवर सुलभ न हो तो कूप पर पर्याप्त जल से शीतकाल में न्यून से न्यून एक बार और उष्ण ऋतु में दो बार अवश्य स्नान करो । जल के निकालने और बर्तने में आलस्य और लोभ न करो । जल की महिमा वेद भगवान् ने भी खूब गाई है -
अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेजसम्
-अथर्ववेद १।४।४

जल में अमृत और औषध है इसीलिए तो जल का नाम जीवन भी है ।
यदि प्रभु-प्रदत्त इस जलरूपी अमृत और औषध का सदुपयोग करोगे तो अनेक प्रकार के लाभ उठाओगे और सब प्रकार से स्वस्थ और रोगमुक्त हो जावोगे ।

(५) सदैव खूब रगड़-रगड़कर घर्षण स्नान करना चाहिए । पैरों और पैरों के तलवों को खूब धोना और साफ करना चाहिए । पैरों के ऊपर नीचे तलवों पर तथा उंगलियों पर किसी प्रकार का मैल न लगा रहे ।

(६) पैरों को साफ रखने से आंखों की ज्योति बढ़ती और रोग दूर होते हैं । विशेषतया इसके साथ कभी-कभी सप्ताह में एक-दो बार पैरों के तलवों की शुद्ध सरसों के तेल से मालिश करना चक्षुओं के लिए बड़ा हितकर है ।

(७) जब कभी तेल की मालिश की जावे तो उस समय शिर और पैर के तलवों की मालिश अवश्य करें ।

(८) प्रतिदिन सोते समय सरसों का तेल थोड़ा गर्म करके एक दो बूंद कानों में डालने से आंखों को बहुत ही लाभ पहुंचता है तथा आंखें कभी नहीं दुखती, साथ ही कानों को लाभ होता है ।
व्यायाम और ब्रह्मचर्य

प्रतिदिन व्यायाम करने से भोजन ठीक पचता है और मलबद्ध (कब्ज) कभी नहीं होता । वीर्य शरीर का अंग बन जाता है जो नष्ट नहीं होता और वीर्य ही सारे शरीर और विशेषतया ज्ञानेन्द्रियों को शक्ति देता है । जब व्यायाम से वीर्य की गति ऊर्ध्व हो जाती है और वह मस्तिष्क में पहुंच जाता है तब चक्षु आदि इन्द्रियों को निरन्तर शक्ति प्रदान करता है और स्वस्थ रखता है । वैसे तो ब्रह्मचर्य सभी लोगों के लिए परमौषध है जैसा कि परम वैद्य महर्षि धन्वन्तरि जी ने कहा भी है –

मृत्युव्याधिजरनाशि पीयूषं प्रमौषधम् ॥

ब्रह्मचर्यं महद्यरत्‍नं सत्यमेव वदाम्यहम् ॥

किन्तु आंखों के लिये तो ब्रह्मचर्य पालन ऐसा ही है जैसा कि दीपक के लिए तेल । जैसे तेल के अभाव में दीपक बुझ जाता है वैसे ही वीर्यरूपी तेल के अभाव वा नाश से नेत्ररूपी दीपक बुझ जाते हैं । वीर्यनाश का प्रभाव सर्वप्रथम नेत्रों पर ही पड़ता है । वीर्यनाश करने वालों की आंखें अन्दर को धंस जाती हैं

और उसे उठते-बैठते अंधेरी आती है । आंखों के चारों ओर तथा मुख पर काले-काले धब्बे हो जाते हैं । आंखों का तेज वीर्य के साथ-साथ बाहर निकल जाता है । वीर्यरक्षा के बिना चक्षुरक्षा के अन्य सब साधन व्यर्थ ही हैं । अतः जिसे अपने आंखों से प्यार है वह कभी भूलकर भी किसी भी अवस्था में वीर्य का नाश नहीं करता और वीर्यरक्षा के लिये नियमपूर्वक अन्य साधनों के साथ-साथ प्रतिदिन व्यायाम भी करता है ।

वैसे तो वीर्यरक्षा तथा आंखों के लिये सब प्रकार के व्यायाम से लाभ पहुंचता है परन्तु शीर्षासन, वृक्षासन, मयूरचाल, सर्वांगासन तो वीर्यरक्षा में परम सहायक तथा आंखों के लिये सब प्रकार के व्यायामों में मुख्य हैं तथा आंखों के लिये गुणकारी हैं

निष्कर्ष यह है कि विद्यार्थी आदि मस्तिष्क से काम करने वाले लोगों को शीर्षासनादि व्यायाम से
जहां अनेक लाभ होते हैं वहां उनकी आंखों के रोग और विकार दूर होते हैं । अतः चक्षुप्रेमियों को प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए ।
अन्य उपाय सं० ३

(१) भोजन से पूर्व हाथ, पैर और सिर धोने से चक्षुओं को लाभ पहुंचता है ।

(२) भोजन के पश्चात् कुल्ला करके हाथ धोकर गीले हाथ आंखों और सिर
पर फेरने से आंखों को लाभ पहुंचता है । (५) सदैव सीधे बैठकर ही पढ़ो । पुस्तक को पढ़ते समय अपने हाथ में आंखों से एक फुट दूर रखो । भूमि वा ऐसे स्थान पर पुस्तक को कभी न रखो जिससे आपको झुकना पड़े । लिखने वा पढ़ने का कार्य कभी झुककर न करो । झुककर लिखने और पढ़ने से आंखें और फेफड़े दोनों ही खराब होते हैं ।

७) रात्रि में दस बजे से पहले सो जाओ । यदि परीक्षा के कारण ज्यादा पढ़ना ही पड़े तो प्रातः तीन वा चार बजे उठकर पढ़ो ।

(८) रात्रि में देर तक पढ़ते रहना और प्रातःकाल देर तक सोते रहना दोनों ही आंखों के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं ।

शनिवार, जून 13, 2015

माहवारी (मासिक धर्म) के सभी दोषों को ऐसे दूर करें : राज

मासिक चक्र की अवधि 28 से 30 दिनों तक की होती है

किशोरावस्था, वृद्धावस्था और गर्भावस्था के दौरान सामान्यत: महिलाओं में माहवारी नहीं होती। लेकिन अगर किसी महिला में सामान्य अवस्था में माहवारी बिना किसी कारण बंद हो जाये, तो इसे माहवारी का अभाव कहते है। इसके कारण हार्मोन में होने वाला बदलाव या बीमारी भी हो सकती है।
अनियमित माहवारी का अर्थ है माहवारी चक्र की अवधि में बदलाव होना। सामान्यत: माहवारी हर महिला में मासिक चक्र की अवधि 28 से 30 दिनों तक की होती है। हर महिला के मासिक चक्रों में 8 दिनों का अंतर होता है। लेकिन 8 से 20 दिनों तक के अंतर को अनियमित माहवारी कहा जाता है। ज्यादातर अनियमित माहवारी के लक्षण होते हैं, जल्दी-जल्दी माहवारी आना, दाग लगना, रक्त के थक्कों का आना। 
माहवारी से पहले के लक्षणों का दिखना बहुत ही सामान्य है। लेकिन अगर किसी महिला में यही लक्षण इतने प्रबल हो जायें, कि उसके रोज़मर्रा के काम भी प्रभावित होने लगें, तो इसे प्रीमेंस्रूअल सिंड्रोम नामक बीमारी कहा जाता है। 
ज्यादातर स्तिथि में पीड़ादायक माहवारी में घरेलू नुस्खों से आराम मिल जाता है। लेकिन जब घरेलू नुस्खे भी आराम नहीं दे पा रहे हों, तो ऐसी सिथति को गंभीरता से लेना चाहिए। पेट के निचले हिस्से को गर्म सेंक दें, इसके लिए आप हीटिंग पैड या गर्म पानी की बोतल का भी प्रयोग कर सकती है।
माहवारी का अनुभव हर लड़की के लिए अलग होता है। कुछ लड़कियों में माहवारी बिना किसी दर्द के हो जाती है और कुछ लड़कियों के लिए माहवारी का समय बहुत ही पीड़ादायक होता है। ऐसे में उन्हें पेट दर्द, सरदर्द और कमर दर्द जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ लड़कियों या महिलाओं को तो दर्द इतना अधिक होता है कि वो माहवारी के दौरान खाना पीना तक छोड़ देती है। 
माहवारी के दौरान असुरक्षित सेक्स नहीं करना चाहिये क्यूंकि इससे बिमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है। भारी व्यायाम के लिए भी यह ठीक नहीं है, ऐसे समय में सामान्य व्यायाम ही किये जा सकते है। ज्यादा नमक मीर्च वाला खाना ना खायें क्यूंकि सरदर्द हो सकता है। टाईट कपडे ना पहनें। 
सैनेटरी पैड रक्त को सोखने के मकसद से बनाये जाते है, इनमे सकत को सोखने की क्षमता कपडे से कहीं ज्यादा होती है। इनका प्रयोग एक बार करके पैड को फैंक देना चाहिये। आजकल बाज़ार में बहुत तरह के सैनेटरी पैड उपलब्ध हैं, जिनका प्रयोग लगभग एक ही तरीके से किया जाता है। कुछ पैड भरी स्त्राव तक का पता नहीं लगने देते और कुछ सामान्य से थोड़े बड़े आकार के होते है।
माहवारी को लेकर बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि, माहवारी के दिनों में सेक्स करने से गर्भ नहीं ठहरता। यह बिलकुल गलत है। कुछ लोगों का मानना है की माहवारी के दिनों में सेक्स अनान्दायक होता है।
डॉक्टरी शब्दों में 80 मिली से अधिक मात्र में रक्त के आने को भारी माहवारी कहते है। भारी स्त्राव का पता लगाने का सबसे आसन तरीका है की आपको कितनी देर में पैड बदलना पड़ रहा है। अगर आपको एक दो घंटे के अन्दर पैड बदलना पड़ रहा है या आपकी माहवारी एक हफ्ते से ज्यादा समय तक रहती है, तो यह भारी स्त्राव माना जाता है। किसी महिला को हर महीने 8 से 10 दिनों तक माहवारी हो रही है।

माहवारी चक्र की सामान्य अवधि 28 से 35 दिनों की होती है और यह किसी भी लड़की के जीवन में हर महीने दोहरायी जाती है, जब तक कि वो गर्भवती ना हो। माहवारी चक्र 8 से 16 साल तक की उम्र में कभी भी शुरू हो सकता है। नियमित माहवारी का अर्थ है 28 से 35 दिनों के अन्तराल पर माहवारी का दोबारा आना. कुछ लडकियों में माहवारी 3 से 5 दिनों तक रहती है, तो कुछ 2 से 7 दिनों तक। 

मासिक धर्म (Periods) से सबन्धित समस्याएँ होना साधारण बात है अक्सर माहवारी की अनियमिता हो जाती है ,अर्थात कई बार रक्तस्त्राव बहुत अधिक हो जाता है और कई बार क्या होता है बिलकुल ही नहीं होता ! और कभी कभी ऐसा भी होता है की ये 2-3 दिन होना चाहिए लेकिन 1 ही दिन होता है ,और कई बार 15 दिन ही दुबारा आ जाता है ! और कई बार 2 महीने तक नहीं आता !
* मासिक धर्म चक्र की अनियमिता की जितनी सभी समस्याएँ है इसकी हमारे आयुर्वेद मे बहुत ही अच्छी और लाभकारी ओषधि है वो है अशोक के पेड़ के पत्तों की चटनी !

* हाँ एक बात याद रखे आशोक का पेड़ दो तरह का है एक तो सीधा है बिलकुल लंबा ज़्यादातर लोग उसे ही अशोक समझते है जबकि वो नहीं है एक और होता है पूरा गोल होता है और फैला हुआ होता है वही असली अशोक का पेड़ है जिसकी छाया मे माता सीता ठहरी थी !

* तो आप इस असली अशोक के 5-6 पत्ते तोड़िए उसे पीस कर चटनी बनाओ अब इसे एक से डेढ़ गिलास पानी मे कुछ देर तक उबाले ! इतना उबाले की पानी आधा से पौन गिलास रह जाए ! फिर उसे बिलकुल ठंडा होने के लिए छोड़ दीजिये और फिर उसको बिना छाने हुए पीये ! सबसे अच्छा है सुबह खाली पेट पीना ! कितने दिन तक पीना ?? 30 दिन तक लगातार पीना उससे मासिक धर्म (periods ) से सबन्धित सभी तरह की बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं ! ये सबसे अधिक अकेली बहुत ही लाभकारी दवा है ! जिसका नुकसान कोई नहीं है ! और अगर कुछ माताओ-बहनो को 30 दिन लेने से थोड़ा आराम ही मिलता है ज्यादा नहीं मिलता तो वो और अगले 30 दिन तक ले सकती है वैसे लगभग मात्र 30 दिन लेने से ही समस्या ठीक हो जाती है !

* ये तो हुई महवारी मे अनियमिता की बात ! अब बात करते पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द की. बहुत बार माताओ -बहनो को ऐसे समय मे बहुत अधिक शरीर मे अलग अलग जगह दर्द होता है कई बार कमड़,दर्द होना ,सिर दर्द होना ,पेट दर्द पीठ मे दर्द होना जंघों मे दर्द होना ,स्तनो मे दर्द,चक्कर आना ,नींद ना आना बेचैनी होना आदि तो ऐसे मे तेज pain killer लेने से बचे क्योंकि इनके बहुत अधिक side effects है , एक बीमारी ठीक करेंगे 10 साथ हो जाएगी और बहुत से pain killer तो विदेशो मे 20 वर्षो से ban है जो भारत मे बिकती है !

* तो आयुर्वेद मे भी इस तरह के दर्दों की तात्कालिक (instant relief ) दवाये है जिसका कोई side effect नहीं है ! तो पीरियडस के दौरान होने वाले दर्दों की सबसे अच्छी दवा है गाय का घी ,अर्थात देशी गाय का घी ! एक चम्मच देशी गाय का घी को एक गिलास गर्म पानी मे डालकर पीना ! पहले एक गिलास पानी खूब गर्म करना जैसे चाय के लिए गर्म करते है बिलकुल उबलता हुआ ! फिर उसमे एक चम्मच देशी गाय का घी डालना ,फिर ना मात्र सा ठंडा होने पर पीना ,चाय की तरह से बिलकुल घूट घूट करके पीना ! बिलकुल सिप सिप करके पीना है ! तात्कालिक (instant relief ) एक दम आराम आपको मिलेगा और ये लगातार 4 -5 दिन जितने दिन पीरियड्स रहते है पीना है उससे ज्यादा दिन नहीं पीना ! ये पीरियडस के दौरन होने वाले सब तरह के दर्दों के लिए instant relief देता है सामान्य रूप से होने वाले दर्दों के लिए अलग दवा है !

* एक बात जरूर याद रखे घी देशी गाय का ही होना चाहिए , विदेशी जर्सी,होलेस्टियन ,फिरिजियन भैंस का नहीं !! देशी गाय की पहचान है की उसकी पीठ गोल सा ,मोटा सा हम्प होता है !कोशिश करे घर के आस पास पता करे देशी गाय का ! उसका दूध लाकर खुद घी बना लीजिये ! बाजारो मे बिक रहे कंपनियो के घी पर भरोसा ना करें ! या भारत की सबसे बड़ी गौशाला जिसका नाम पथमेड़ा गौशाला है जो राजस्थान मे है यहाँ 2 लाख से ज्यादा देशी गाय है इनका घी खरीद लीजिये ये पूरा देशी गाय के दूध से ही बना है ! काफी बड़े शहरो मे उपलब्ध है !

*** अंत जब तक आपको जीवन मे आपको मासिक धर्म रहता है आप नियमित रूप से चूने का सेवन करें ....!

गीला चूना , जो पान वाले के पास से मिलता है कितना लेना है ....?

गेहूं के दाने जितना..... ! 

कैसे लेना है .....?बढ़िया है की सुबह सुबह खाली पेट लेकर काम खत्म करे आधे से आधा गिलास पानी हल्का गर्म करे गेहूं के दाने के बराबर चूना डाले चम्मच से हिलाये पी जाए.... ! 

इसके अतिरिक्त दही मे ,जूस मे से सकते है बस एक बात का ध्यान रखे कभी आपको पथरी की समस्या रही तो चूने का सेवन ना करे..... ! 

ये चुना बहुत ही अच्छा है बहुत ही ज्यादा लाभकरी है मासिक धर्म मे होने वाली सब तरह की समस्याओ के लिए.... !

इसके अतिरिक्त आप जंक फूड खाने से बचे , नियमित सैर करे…

गुरुवार, जून 11, 2015

धूल, जहरीली गैस- सिगरेट के धुंआ से होनेवाले एलर्जी से बचाव

गंभीर रूप लेती जा रही एलर्जी : कारण, लक्षण एवं उपचार : राज 

To protect against Dust-Air-Animal Allergies such


एलर्जी या अति संवेदनशीलता आज की लाइफ में बहुत तेजी से बढ़ती हुई सेहत की बड़ी परेशानी है। कभी कभी एलर्जी गंभीर परेशानी का भी सबब बन जाती है। जब हमारा शरीर किसी पदार्थ के प्रति अति संवेदनशीलता दर्शाता है तो इसे एलर्जी कहा जाता है और जिस पदार्थ के प्रति प्रतिकिर्या दर्शाई जाती है उसे एलर्जन कहा जाता है। एलर्जी किसी भी उम्र में हो सकती है, आपके परिवार में अगर किसी को एलर्जी है, तो यह आपको भी हो सकती है. यह भी हो सकता है कि आपके माता-पिता दोनों को ही एलर्जी हो, लेकिन आपको यह नहीं हो. हमारे बाहर के वातावरण का भी इस पर प्रभाव होता है. लाल रंग के चकत्ते, काले धब्बे, फुंसियां और दाग, ये सब एलर्जी का ही लक्षण हैं. अगर सही समय पर एलर्जी पर ध्यान न दिया जाए तो यह कभी कभी जीवन के लिए भी घातक हो जाती है. एलर्जी होने के कई कारण हो सकते हैं.

एलर्जी के कारण –

एलर्जी किसी भी पदार्थ से ,मौसम के बदलाव से या आनुवंशिकता जन्य हो सकती है। एलर्जी के कारणों में धूल, धुआं, मिटटी पराग कण, पालतू या अन्य जानवरों के संपर्क में आने से, सौंदर्य प्रशाधनों से, कीड़े-बर्रे आदि के काटने से, खाद्य पदार्थों से एवं कुछ अंग्रेजी दवाओ के उपयोग से एलर्जी हो सकती है। सामान्तया एलर्जी नाक, आँख, श्वसन प्रणाली, त्वचा व खान पान से सम्बंधित होती है किन्तु कभी कभी पूरे शरीर में एक साथ भी हो सकती है जो की गंभीर हो सकती है।

स्थानानुसार एलर्जी के लक्षण –

नाक की एलर्जी -नाक में खुजली होना ,छीकें आना ,नाक बहना ,नाक बंद होना या बार बार जुकाम होना आदि|
आँख की एलर्जी -आखों में लालिमा ,पानी आना ,जलन होना ,खुजली आदि।
श्वसन संस्थान की एलर्जी -इसमें खांसी ,साँस लेने में तकलीफ एवं अस्थमा जैसी गंभीर समस्या हो सकती है।
त्वचा की एलर्जी -त्वचा की एलर्जी काफी कॉमन है और बारिश का मौसम त्वचा की एलर्जी के लिए बहुत ज्यादा मुफीद है त्वचा की एलर्जी में त्वचा पर खुजली होना ,दाने निकलना ,एक्जिमा ,पित्ती उछलना आदि होता है।
खान पान से एलर्जी -बहुत से लोगों को खाने पीने की चीजों जैसे दूध ,अंडे ,मछली ,चॉकलेट आदि से एलर्जी होती है।
सम्पूर्ण शरीर की एलर्जी -कभी कभी कुछ लोगों में एलर्जी से गंभीर स्तिथि उत्पन्न हो जाती है और सारे शरीर में एक साथ गंभीर लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ऐसी स्तिथि में तुरंत हॉस्पिटल लेकर जाना चाहिए।
अंग्रेजी दवाओं से एलर्जी-कई अंग्रेजी दवाएं भी एलर्जी का सबब बन जाती हैं। जैसे पेनिसिलिन का इंजेक्शन जिसका रिएक्शन बहुत खतरनाक होता है और मौके पर ही मोत हो जाती है। इसके अलावा दर्द की गोलियां, सल्फा ड्रग्स एवं कुछ एंटीबायोटिक दवाएं भी सामान्य से गंभीर एलर्जी के लक्षण उत्पन्न कर सकती हैं।
मधु मक्खी ततैया आदि का काटना –इनसे भी कुछ लोगों में सिर्फ त्वचा की सूजन और दर्द की परेशानी होती है जबकि कुछ लोगों को इमर्जेन्सी में जाना पड़ जाता है।
1.आंखों में खुजली, लाली, सूजन, जलन या पानी जैसा द्रव बहना.
2.सांस की नाली बंद हो जाना.
3.गले में खुजली, खांसी.
4.त्वचा पर खुजली और लाल चकत्ते पड़ना.
5.ब्लड प्रेशर कम हो जाना.
6.नाक में खुजली, नाक बंद होना और बहना.
7.छीकना और इसके बाद कभी-कभी दमे का दौरा पड़ना.
8.मुंह के आसपास सूजन या निगलने कठिनाई.
9.घरघराहट, सीने में जकड़न, जोर से साँस लेना या साँस लेने में कठिनाई.
10.गम्भीर एलर्जी की अवस्था में रोगी को बेहोशी भी होने लगती है.

एलर्जी से बचाव –

  • सोंठ, काली मिर्च, छोटी पीकर और मिश्री सभी द्रव्यों का चूर्ण 10-10 ग्राम, बीज निकाला हुआ मुनक्का 50 ग्राम, गोदंती हरताल भस्म 10 ग्राम तथा तुलसी के दस पत्ते सभी को मिलाकर खूब घोंटकर पीस लें और 3-3 रत्ती की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखा लें। 2 गोली सुबह व 2 गोली शाम को गर्म पानी के साथ तीन माह तक सेवन करें। ठंडे पदार्थ, बर्फ, दही, ठंडे पेय से परहेज करें। नाक की एलर्जी दूर हो जाएगी।
  • आंखों में पानी, बहती नाक, लगातार छींक और कमजोरी जैसे लक्षणों से तो आप वाकिफ होंगे ही, खासकर इन दिनों जब मौसम बदल रहा है और दिन बीतने के साथ ही हवा में नमी भी बढ़ती जा रही है। ऐसे में एेलर्जी की समस्या को नज़रअंदाज करना आपको इन्हीं परेशानियों की गिरफ्त में डाल देगा। लेकिन आपकी जरा सी सावधानी आपको एेलर्जी अटैक से आसानी से बचा सकती है।
  • एलर्जी से बचाव ही एलर्जी का सर्वोत्तम इलाज है। इसलिए एलर्जी से बचने के लिए इन उपायों का पालन करना चाहिए।.य़दि आपको एलर्जी है तो सर्वप्रथम ये पता करें की आपको किन किन चीजों से एलर्जी है इसके लिए आप ध्यान से अपने खान पान और रहन सहन को वाच करें।
  • घर के आस पास गंदगी ना होने दें।
  • घर में अधिक से अधिक खुली और ताजा हवा आने का मार्ग प्रशस्त करें।
  • जिन खाद्य पदार्थों से एलर्जी है उन्हें न खाएं।
  • एकदम गरम से ठन्डे और ठन्डे से गरम वातावरण में ना जाएं।
  • बाइक चलाते समय मुंह और नाक पर रुमाल बांधे,आँखों पर धूप का अच्छी क़्वालिटी का चश्मा लगायें।
  • गद्दे, रजाई,तकिये के कवर एवं चद्दर आदि समय समय पर गरम पानी से धोते रहे।
  • रजाई ,गद्दे ,कम्बल आदि को समय समय पर धूप दिखाते रहे।
  • पालतू जानवरों से एलर्जी है तो उन्हें घर में ना रखें।
  • ज़िन पौधों के पराग कणों से एलर्जी है उनसे दूर रहे।
  • घर में मकड़ी वगैरह के जाले ना लगने दें समय समय पर साफ सफाई करते रहे।
  • धूल मिटटी से बचें ,यदि धूल मिटटी भरे वातावरण में काम करना ही पड़ जाये तो फेस मास्क पहन कर काम करें।
  • नाक की एलर्जी -जिन लोगों को नाक की एलर्जी बार बार होती है उन्हें सुबह भूखे पेट। चम्मच गिलोय और 2 चम्मच आंवले के रस में 1 चम्मच शहद मिला कर कुछ समय तक लगातार लेना चाहिए। इससे नाक की एलर्जी में आराम आता है ,सर्दी में घर पर बनाया हुआ या किसी अच्छी कंपनी का च्यवनप्राश खाना भी नासिका एवं साँस की एलर्जी से बचने में सहायता करता है। आयुर्वेद की दवा सितोपलादि पाउडर एवं गिलोय पाउडर को 1-1 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम भूखे पेट शहद के साथ कुछ समय तक लगातार लेना भी नाक एवं श्वसन संस्थान की एलर्जी में बहुत आराम देता है।
  • जिन्हे बार बार त्वचा की एलर्जी होती है उन्हें मार्च-अप्रेल के महीने में जब नीम के पेड़ पर कच्ची कोंपलें आ रही हों उस समय 5-7 कोंपलें 2-3 कालीमिर्च के साथ अच्छी तरह चबा चबा कर 15-20 रोज तक खाना त्वचा के रोगों से बचाता है, हल्दी से बनी आयुर्वेद की दवा हरिद्रा खंड भी त्वचा के एलर्जी जन्य रोगों में बहुत गुणकारी है। इसे किसी आयुर्वेद चिकित्सक की राय से सेवन कर सकते हैं।


    ऑलिव ऑयल

    रैशेज पर ऑलिव ऑयल लगाने से आपको तुरंत आराम मिलेगा। खासतौर पर एलर्जी से होने वाली जलन और खुजली शांत करने में ऑलिव ऑयल कारगर है।

    कॉड लिवर ऑयल व विटामिन ई
    विटामिन ई ऑयल में कॉड लिवर ऑयल मिलाकर रैशेज पर लगाएं और रात भर छोड़ दें। सुबह तक रैशेज दब जाएंगे।

    तुलसी पत्ते का पैक
    तुलसी पत्ते को पीस लें। इसमें एक चम्मच ऑलिव ऑयल, दो लहसुन के जवे, एक चुटकी नमक और एक चुटकी काली मिर्च मिलाएं। इसे रैशेज पर लगाएं और थोड़ी देर बाद साफ कर लें।

    वेनेगर और शहद
    एक चम्मच एप्पल साइडर वेनेगर में शहद मिलाएं और एक ग्लास पानी में मिलाएं। इसे दिन में तीन बार रैशेज पर लगाएं, आराम मिलेगा।

सभी एलर्जी जन्य रोगों में खान पान और रहन सहन का बहुत महत्व है इसलिए अपना खान पान और रहन सहन ठीक रखते हुए यदि ये उपाय अपनाएंगे तो अवश्य एलर्जी से लड़ने में सक्षम होंगे और एलर्जी जन्य रोगों से बचे रहेंगे। एलर्जी जन्य रोगों में अंग्रेजी दवाएं रोकथाम तो करती हैं लेकिन बीमारी को जड़ से ख़त्म नहीं करती है जबकि आयुर्वेद की दवाएं यदि नियम पूर्वक ली जाती है तो रोगों को जड़ से ख़त्म करने की ताकत रखती हैं।

इन बातों पर भी ध्यान दें- 

अल-सुबह बाहर निकलने से बचें 

अक्सर ये देखने में आया है कि तेज़ और शुष्क हवा के संपर्क में आने से लोग जल्दी एेलर्जी का शिकार हो जाते हैं। इस दौरान परागकण हवा के साथ-साथ तेजी से फैलते हैं। लिहाजा सुबह 5-10 बजे के बीच खुली हवा में निकलने से बचें। हालांकि एेलर्जी की दवा लेने के बाद सुबह की ताजा हवा का लुत्फ लिया जा सकता है।

स्नान करें

धूल और पराग के महीन कणों को नंगी आंखों से देख पाना बेहद मुश्किल होता है। ये आपके शरीर और कपड़ों से चिपक जाते हैं जो कि आपकी एेलर्जी का कारण बनते हैं। ऐसे में बाहर से आने के बाद शॉवर लेना बेहतर उपाय है।

ड्राइविंग के दौरान कार का शीशा बंद रखें

ड्राइविंग के दौरान गाड़ी का शीशा बंद रखने से आप बाहर की हवा के सीधे संपर्क में नहीं आ पाते हैं। नतीजतन आप कम से कम धूल और परागकणों को इनहेल करते हैं।

हाथों को धोना

एेलर्जी का एक और सबसे बड़ा कारण गंदे हाथों से अपने चेहरे को बार-बार छूना भी होता है। ऐसे में अपने हाथों को थोड़े-थोड़े अंतराल पर धोकर साफ करते रहना चाहिए, और बार-बार चेहरा छूने से बचना चाहिए।

ऐल्कॉहॉल से दूर रहें

एेलर्जी के दौरान ऐल्कॉहॉल लेने से बचें क्योंकि ये आपके नाक में म्यूकस का प्रॉडक्शन बढ़ा देता है। शुष्क हो जाने के कारण आपकी नाक के आस-पास की त्वचा दर्द के साथ उखड़ने भी लगती है। ये समस्या बार-बार नाक छूने से और बढ़ जाती है।

मास्क पहनें

धूलकणों के सीधे संपर्क में आने का एक और बेहतरीन उपाय मास्क पहनना है। खुली हवा में मास्क पहन कर निकलने से आप आसानी से एेलर्जी वाले धूल कणों से बच सकते हैं, क्योंकि वो मास्क के जरिए फिल्टर कर लिए जाते हैं। जापान में तो बड़े पैमाने पर रेस्पिरेटरी मास्क का प्रयोग किया जाता है। आप नाक और मुंह ढकने के लिए मास्क की जगह साधारण रुमाल का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

एेलर्जी हो भी जाए तो क्या

और अगर तमाम उपायों के बाद भी आप एेलर्जी की चपेट में आ भी जाएं तो घबराने की जरूरत नहीं है। साधारण अटैक में आप ऐंटीहिस्टामाइन की एक डोज़ ले सकते हैं जबकि अगर समस्या ज्यादा गंभीर है, तो डॉक्टर को दिखाना ही सही उपाय है।

शनिवार, जून 06, 2015

सेहत का खजाना : गर्मी का राजा ‘पुदीना’

गर्मी के मौसम में कई बड़ी बीमारियों
से बचाता है ‘पुदीना’


पुदिना सेहत के लिए तो अच्छा होता ही है ये गर्मी के मौसम में आपको कई बड़ी बीमारियों से भी बचाता है। मौसम की मांग के चलते पुदिना मार्केट में बहुत ही महंगे भाव में मिल रहा है।  पुदिना खाने का जायका बढाता है और पेट के लिए ठंडा होता है। पुदिना को जरूर खाना चाहिये क्‍योंकि यह पौष्टिकता से भरी होती है। 
आयुर्वेद के अनुसार पुदीना रूचिवर्ध्दक, स्वादिष्ट, सुगंधित, दिल के लिये फायदेमंद रूखा, तीखा, वात व कफ के विकार को दूर करने वाला, खांसी व नशा नाशक, पाचन शक्ति की कमजोरी, बदहजमी, आफरा, पेट दर्द, अतिसार, संग्रहणी, हैजा, पुराना बुखार और कृमिनाशक होता है। हिन्दी में इसे पुदीना, संस्कृत में पूतिहा, अंग्रेजी में स्पिअर मिण्ट, लैटिन में मेन्था स्पाइकेटा, गुजराती में फुदीनो, मराठी में पुदिना, बंगला में पोदीना, तमिल में पुदीना, पारसी में पुदिन नाम से जाना जाता है। पुदीने का प्रयोग पुरातन काल से होता आ रहा है। भोजन में पुदीने की जितनी उपयोगिता है, उतनी दूसरी शाक सब्जी या फल की नहीं है। चाहे शर्बत तैयार करना हो, महकदार चटनी का जायका लेना हो अथवा कढ़ी में भी महकदार पैदा करनी हो, रायता, छाछ, केरी का पानी हो इन सभी में पोदीने को डालकर जायकेदार बनाया जा सकता है। पुदीने से तमाम शारीरिक शिकार भी समाप्त हो जाते हैं। यदि लगातार पुदीने का प्रयोग किया जाता है, तो काया में व्याधि होने की सम्भावना भी कम हो जाती है। पुदीना अपनी सुगंध, खुशबू के लिए संसार में सर्वोपरि मान गया है। च्युंगम, मुखशुध्दि पेय तथा दंत पेस्ट आदि बनाने वाली सभी कम्पनियां किसी न किसी रूप में थोड़ी या अधिक मात्रा में पुदीने के रस का प्रयोग करती है। कहा जाता है कि पुदीने की पत्ती मुंह में रखकर चूसते रहना अमृत जैसा है। पुदीना विटामिन ‘ए’ की खान है। पुदीने में जितने विटामिन पाये जाते हैं, उतने न तो किसी विशेष वस्तु में होते हैं न ही किसी दवा में होते हैं। पुदीना एक विलक्षण व अनुपम औषधि है।
पुदीने को सामान्यत: तीन किस्मों में विभाजित किया जाता है। वन्य (जंगली) पुदीना, पर्वतीय (पहाड़ी) पुदीना और जलीय पुदीना।

पुदीने के औषधीय उपयोग-

  • सलाद में इसका उपयोग स्वास्थ्यवर्ध्दक है। प्राय: प्रतिदिन इसकी पत्ती चबाई जाये तो दंत क्षय, मसूढ़ों से रक्त निकलना, पायरिया आदि रोग कम हो जाते हैं। यह एण्टीसेप्टिक जैसा कार्य करता है, और दांतों तथा मसूढ़ों को आवश्यक पोषक तत्व पहुंचाता है।
  • एक गिलास पानी में पुदीने की 4/5 पत्तियां डालकर उबालें ठण्डा होने पर फ्रिज में रख दें। इस पानी से कुल्ला करने पर मूंह की दुर्गंध दूर हो जाती है।
  • पुदीना कीटनाशक है यदि घर के चारों तरफ पुदीना के तेल का छिड़काव कर दिया जाये तो मक्खी, मच्छर, चींटी आदि कीटाणु भाग जाते हैं।
  • पुदीने की पत्तियों को पीसकर चेहरे पर लेप करने से, भाप लेने से मुहांसे, चेहरे की झाइयों एवं दागों में लाभ होता है।
  • एक टब में पानी भरकर उसमें कुछ बूंदें पुदीने का तेल डालकर यदि उसमें पैरों को रखा जाये तो थकान से राहत मिलती है, और बिवाईयों के लिए बहुत लाभकारी है।
  • पुदीने का ताजा रस क्षय रोग, अस्थमा एवं विचित्र प्रकार के श्वास रोगों में बहुत ही लाभकारी है।
  • पानी में नींबू का रस पुदीना एवं काला नमक मिलाकर पीने से मलेरिया के बुखार में राहत मिलती है।
  • हकलाहट दूर करने के लिए पुदीने की पत्तियों में काली मिर्च पीस लें तथा सुबह शाम एक एक चम्मच सेवन करे। हकलाहट दूर हो जायेगी।
  • हिचकी की शिकायत होने पर इसकी पत्तियों को चूसने से या इसके रस को शहद के साथ लेने से राहत मिलती है।
  • प्राकृतिक भोजन में रूचि रखने वाले लोगों में पुदीना डालकर बनाई गई चाय अच्छी रहती है, तथा पुदीने की चाय में एक दो चुटकी नमक मिलाकर पीने से खांसी में लाभ होता है।
  • हैजे में पुदीना, प्याज का रस, नींबू का रस समान मात्रा में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। उल्टी-दस्त, हैजा हो तो आधा कप रस हर घण्टे के अन्तराल पर रोगी को पिलाये।
  • पुदीने का ताजा रस शहद के साथ सेवन करने से ज्वर दूर हो जाता है, तथा न्यूमोनिया से होने वाले विकार भी नष्ट हो जाते हैं। यदि आंतों की खराबी शिथिलता या अन्य पेट के कोई अन्य रोग हो तो पुदीना सेवन कर इन्हें दूर किया जा सकता है।
  • पेट में अचानक दर्द उठता हो, मरोड़ हो तो अदरक और पुदीने के रस में थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर सेवन करे। पेट दर्द में राहत मिलेगी।
  • मुंह में छाले हो गये हो तो पुदीने के गाढ़े क्वाथ में रूई के फाहों को अच्छी तरह भिगोकर लगाने से छाले तथा घाव ठीक होकर राहत मिलती है।
  • नकसीर की शिकायत होने पर प्याज एवं पुदीने का रस मिलाकर नाक में डाल देने से नकसीर के रोगियों को बहुत लाभ होता है।
  • आजकल तो बाजार में ‘पुदीन हरा’ नामक औषधि प्रचलन में आ गई है। जो अजीर्ण बदहजमी, पेट दर्द में रामबाण है।
अगर आप पुदिना खाने का शौक रखते हैं, तो इसे अपने घर पर ही उगाएं।  इसे बडे से गमले में उगाइये जिससे आप हर वक्‍त इसका आनंद ले सकें। पुदिना को घर पर उगाना बहुत ही आसान है आइये जानते हैं कि पुदिना को घर पर कैसे उगाया जा सकता है।
पुदीना का छोटा पौधा कहीं भी किसी भी जमीन व यहां तक कि गमले में भी आसानी से उग जाता है। यह गर्मी को झेलने की शक्ति रखता है। इसे किसी भी उर्वरक की आवश्यकता नहीं पड़ती है। थोड़ी सी मिट्टी और पानी इसके विकास के लिये पर्याप्त है। पुदीना की उपज किसी भी समय ली जा सकती है। गर्मी के दिनों में तो इसकी उपज व बढ़वार अच्छी होती है। इसकी पत्तियों को ताजा तथा सुखाकर भी प्रयोग में लाया जा सकता है।

घर पर ऎसे उगाएं पुदिना का पौधा -

1. गमला और जगह चुनें- पुदिना लगाने के लिये गमला काफी बड़ा होना चाहिये जिससे वह आराम से लग जाए। गमले को सूरज की तेज धूप से दूर रखें साथ ही इसे दूसरे पौधों के पास नही रखें। पुदिना को ज्‍यादा धूप की जरूरत नहीं होती। इसे इंफेक्‍शन से बचाने के लिये इन्‍हें दूसरे गमलों के पास ना रखें। 

2. बीज बोना- बीज को किसी भी समय बोया जा सकता है। फिर यह आठ हफ्तों के अदंर बिल्‍कुल ठंड में उगेगा। बीज को मिट्टी में दो इंच नीचे बोना चाहिये। 

3. पानी- पुदिना के पौधे को उगने के लिये नमी की जरूरत होती है। पर इन्‍हें इतना भी पानी ना दें कि यह सड़ जाए। पानी की सही मात्रा ही दी जानी चाहिये। पौधों को सही तरह से नमी प्राप्‍त हो इसके लिये पौधे के चारों ओर फूल, फलों की पत्‍तियों को बिछा दें। इससे अत्‍यधिक पानी वे सोख लेगें और आपका पौधा खराब भी नहीं होगा। पुदिना को दिन में दो बार पानी दें।

4. गमले की खाद- पुदिना के पौधों को अच्‍छी तरह से उगने के लिये खाद की आवश्‍यकता पड़ती है। इसलिये उन्‍हें हर 10 दिन बाद प्राकृतिक खाद ही दें। खाद तब तक डालें जब तक कि वह कटाई योग्‍य ना हो जाएं। प्राकृतिक खाद में किचन का वेस्‍ट, गांय का गोबर या फिर अन्‍य फल और पत्तियों का इस्‍तमाल किया जा सकता है। 

5. कटाई- वैसे पुदिना के पौधों को उगने में 6 से 8 हफ्ते आराम से लग जाते हैं। आप चाहें तो गमले से केवल पत्तियों को तोड़ सकती हैं या फिर पूरे पौधों को जड़ सहित ही निकाल सकती हैं। पौधों को उस पर फूल लगने से पहले ही काट लेना चाहिये।

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